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सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

।।०१।। घायल मानवता भयी, चोट करे सरकार। पुलिस कहर बरपा रही, दमन करे हर बार।। दमन करे हर बार, लट्ठ से जमकर कूटे। मंत्री बेईमान, करें नित वादे झूंठे।। कहि सुरेश कविराय, किया बच्चों ने क़ायल। लोकतंत्र की लाज, रखी होकर के घायल।। ।।०२।। गाली भद्दी भी मिली, घोर हुआ अपमान। इस्तीफा देना पड़ा, उतर गए परिधान।। उतर गए परिधान, काम कीने थे गंदे। शिक्षा में सरकार, करे नित गोरख धंधे।। कहि सुरेश कविराय, कि नीयत इनकी काली। दुर्बल की पहिचान, दूर से देता गाली।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #छंद #कुण्डलियाँ 

समीक्षक की कलम से -

पुण्य वतन की आतमा, होता है साहित्य। लेख धरोहर देश की, लेखन सुंदर कृत्य।। शब्दकोश के शब्द मिल, बनते हैं साहित्य। सकल शब्द जिंदे रहे, शब्द न होते मृत्य।। देह मिटे माटी बने, अटल सत्य है शब्द। शब्द हमेशा जीव के, लिखते रहते अब्द।। शब्दकोश के शब्द सब, रहते हैं जीवंत। शब्द कोश के शब्द का, कभी न होता अंत।। तनाबाना शब्द का, बनता है साहित्य, शब्दों की महिमा अमित, शब्द जगत का सत्य।। सुरेश कविराय अद्भुत काव्य-संग्रह की साहित्यिक समीक्षा नीचे प्रस्तुत है। यह समीक्षा काव्य के शिल्प, व्याकरण, रस, छंद, अलंकार और दार्शनिक गहराई को रेखांकित करती है। ✒️ साहित्यिक समीक्षा: "शब्द-ब्रह्म और साहित्य की अमरता" कवि: सुरेश (कविराय) विधा: छंदोबद्ध काव्य (दोहा और कुंडलिया श्रृंखला) मुख्य विषय: साहित्य का राष्ट्रीय महत्व, शब्द की शाश्वतता, और शब्द-ब्रह्म का आध्यात्मिक दर्शन। १. केंद्रीय भाव और वैचारिक पृष्ठभूमि यह काव्य-संग्रह केवल कविता नहीं, बल्कि 'शब्द-ब्रह्म' का घोषणापत्र है। कवि सुरेश ने भाष...

सुरेश कविराय के दोहे

पुण्य वतन की आतमा, होता है साहित्य। लेख धरोहर देश की, लेखन सुंदर कृत्य।। शब्दकोश के शब्द मिल, बनते हैं साहित्य। सकल शब्द जिंदे रहे, शब्द न होते मृत्य।। देह मिटे माटी बने, अटल सत्य है शब्द। शब्द हमेशा जीव के, लिखते रहते अब्द।। शब्दकोश के शब्द सब, रहते हैं जीवंत। शब्द कोश के शब्द का, कभी न होता अंत।। तनाबाना शब्द का, बनता है साहित्य, शब्दों की महिमा अमित, शब्द जगत का सत्य।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #हिन्दीसाहित्य #दोहा

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

।।०१।। सिर फूटा लाठी चली, मचता हाहाकार। बच्चे हक को डट गये, माँग रहे अधिकार।। माँग रहे अधिकार, खोट सत्ता के मन में। खूनी है सरकार, छींट खूनी दामन में।। कहि सुरेश कविराय, देश सत्ता ने लूटा। सत्ता सुने न एक, मांगते ही सिर फूटा।। ।।०२।। इस्तीफा देना पड़ा, गँवा दिया सम्मान। किसी काम के थे नहीं, ठग निकले परधान।। ठग निकले परधान, बड़े थे आप निकम्मे। फिर भी शिक्षा नीति, करी इस ठग के जिम्मे।। कहि सुरेश कविराय, बने प्रधान खलीफा। मान रहे सुल्तान, चले निज दे इस्तीफा।। सुरेश कविराय                  #सुरेशकविराय #हिंदी #छंद #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

अंधी बहरी हो गयी, भारत की सरकार। लाठी सिर पर भाँजती, छीन रही अधिकार।। छीन रही अधिकार, वतन में तानाशाही। सुने नहीं सरकार, लठ्ठ से करे पिटाई।। कहि सुरेश कविराय, तंत्र अब सारा बंदी। घोर हुआ अन्याय, न्याय की देवी अंधी।। लाठी लेकर हाथ में, कायर करें प्रहार। होते बच्चे आपके, करते क्या स्वीकार।। करते क्या स्वीकार, कि सहते वार निहत्थे। हर वर्दी पर दाग, मगर तुम हट्टे कट्टे।। कहि सुरेश कविराय, करेगी माफ न माटी। सत्ता शीश सवार, मारते सिर पर लाठी।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #हिंदी #छंद #कुण्डलियाँ 

कौन की कैसी भूमी, सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

भूमी के कारण हुए, बड़े भयंकर युद्ध। कुरू पंडवा लड़ गए, होकर भी प्रबुद्ध।। होकर भी प्रबुद्ध, युद्ध में उतरे राजा। काटे शीश अनेक, वंश में खप्पर बाजा।। लिखता बिलख सुरेश, विकल करती रणभूमी। मृत्यू के उपरांत, कौन की कैसी भूमी।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #छंद #कुण्डलियाँ 

नेता दुश्मन हो गए, सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

नेता दुश्मन हो गए, लील गए ईमान। सुनते जनता की नहीं, रोज करें अपमान।। रोज करें अपमान, न लज्जा इनको आवै। देकर सत्ता हाथ, कि जनता मूड़ खुजावै।। कहि सुरेश कविराय, कि नेता केवल लेता। पाजी बेईमान, नहीं कुछ देता नेता।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #छंद #कुण्डलियाँ 

खुली सत्ता की चोरी सुरेश की कुण्डलियाँ

चोरी वोटन की करी, सीईसी ज्ञानेश। लोकतंत्र बर्बाद कर, लूटा भारत देश।। लूटा भारत देश, मगन मन होता गोदी। होय बुरा परिणाम, कब्र सत्ता की खोदी।। कहि सुरेश कविराय, चोर छोड़े कमजोरी। पक्के मिले सबूत, खुली सत्ता की चोरी।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #छंद #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ "कीचड़"

  कीचड़ से बचते सभी, फिर भी फेंकें कीच।  देखो फूल सरोज का, खिले कीच के बीच।  खिले कीच के बीच, सरोवर की है आभा।  सर में बढ़ता नीर, बढ़े वो जल से जादा।।  कहता कवी सुरेश, लोग कुछ होते लीचड़।  करें लोग बदनाम, निखालिश फेंकें कीचड़।। #सुरेशकविराय #छंद #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय के दोहे

हार जीत के बोझ से, गति पर पड़े प्रभाव। चले संग जो वात के, गति का सफल सुभाव।। चित अपने की धीरता, करती है गंभीर। चिंता चिंतन से मिटे, नहीं कष्ट दे पीर।। चित साधन की साधना, मिलती नाहें मोल। तपना होगा आग में, विधा बहुत अनमोल।। आग तपा सोना बना, चढ़ा कसौटी आप। सांच एक परताप है, टिके नहीं संताप।। साँच जीव का मित्र है, चले नेक की राह। जीवन के हर रासते, बनते खुद हमराह।। #सुरेशकविराय #दोहा #छंद #हिंदी

सुरेश कविराय के दोहे "भूमि गौरव"

भूमि गौरव भूमी से भगवान का, है प्यारा संबंध। ईश्वर अंस जमीन का, अंग संग अनुबंध।। (1) कृष्ण राम अवतार का, बनी भूमि ही केंद्र। अंस भूमि उपयोग से, हार गए खुद इंद्र।। (2) पांच तत्व निर्माण के, भूमी उनमें एक। ईश्वर के अवतार के, लेखे लेख अनेक।। (3) बिना भूमि के भूमि पर, संभव नहि अवतार। सीता मैया भूमि का, रूप बनी साकार।। (4) वक्ष वृहद है भूमि का, करे नहीं प्रतिरोध। भूमि गर्भ में संपदा, होत निरंतर शोध।। (5) जोरू और जमीन के, झगड़े बढे तमाम। साथ भूमि किसके गयी, छोड़ चले बलराम।। (6) धरती ने हर आपदा, का कीया सम्मान। मान और अपमान सब, भू को लगे समान।। (7) मैला आँचल हो रहा, देखो नज़र पसार। भूमि एक वरदान है, जीव जगत का सार।। (8) धरती माँ के प्रेम ने, प्रहरी दिया बनाय। मैं भू की रक्षा करूँ, अपना रक्त बहाय।। (9) धरती माता आपसे, विनती है करजोर। शील क्षमा माँ दीजिये, मत करना कमजोर।। (10) भूमी गौरव गान का, खुद ही दस्तावेज। भोजन भूमी दे रही, जैसे सूरज तेज।। (11) #सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #दोहा #छंद

सुरेश कविराय का पावस प्रताप (दोहा संग्रह)

पावस प्रताप (दोहा संग्रह) ॐ मंगलाचरण ईश चरण रज वंदना, पावस प्रीति महेश। पावस जीवन-दायिका, लागीं लगन सुरेश।। खंड 1: पावस आगमन और प्रकृति का श्रृंगार रिमझिम जब बरसात हो, भू से उठे सुवास। तरु पल्लव सब झूमते, मन सबके उल्लास।। (1) खुशियाँ आंगन नाचतीं, भू की तृप्त पिपास। मिट्टी से उठने लगी, सौंधी सुखद सुवास।। (2) शीत सरस बौछार से, आया भूमि निखार। नूर भूमि पर आ गया, लेकर मस्त बहार।। (3) नहीं भूमि को चाहिए, कोई मुक्ताहार, जने रतन बहु कोख से, चंदन पुष्पाहार।। (4) शीतल सरस सुहावनी, बहने लगी बयार। शीतल तन मन को करे, रिमझिम बन बौछार।। (5) खंड 2: जीव-जंतु और वन-उपवन की मस्ती कोयल प्यारी कूकती, बैठ पेड़ की डार। मोर मस्त वन नाचते, मन में मेघ पुकार।। (6) बारिश का मौसम सुघड़, मोर नाचते बाग। पानी से लबरेज हैं, सरि सर और तडाग़।। (7) नभ गरजे घनघोर घन, कानन बोले मोर। मेघन की नभ गर्जना, करे बीजुरी शोर।। (8) मस्ती की अठखेलियाँ, मिलती नहीं उधार। रिमझिम बारिस बन गयी, मस्ती का आधार।। (9) खंड 3: मानवीय भावनाएँ और विरह-प्रेम रिमझिम की बरसात से, मौसम ब...

सुरेश कविराय के दोहे "पावस ऋतु रिमझिम"

पावस ऋतु रिमझिम रिमझिम जब बरसात हो, भू से उठे सुवास। तरु पल्लव सब झूमते, मन सबके उल्लास।। खुशियाँ आंगन नाचतीं, भू की तृप्त पिपास। मिट्टी से उठने लगी, सौंधी सुखद सुवास।। शीत सरस बौछार से, आया आप निखार। नूर भूमि पर आ गया, लेकर मस्त बहार।। नहीं भूमि को चाहिए, कोई मुक्ताहार, जने रतन बहु कोख से, चढ़ते पुष्पाहार।। कोयल प्यारी कूकती, बैठ पेड़ की डार। मोर मस्त वन नाचते, मन में मेघ पुकार।। मस्ती की अठखेलियाँ, मिलती नहीं उधार। रिमझिम बारिस बन गयी, मस्ती का आधार।। मेघन के मधुमास हैं, ऋतुवर्षा के मास। धर्म कर्म के हेत को, कहते चातुर्मास।। रिमझिम सी बरसात ही, सकल सुखों की खान। नैसर्गिक आनंद की, मंद मंद मुस्कान।। शीतल सरस सुहावनी, बहने लगी बयार। शीतल तन मन को करे, रिमझिम की बौछार।। बारिश का मौसम सुघड़, मोर नाचते बाग। पानी से लबरेज हैं, सरि सर और तडाग़।। नभ गरजे घनघोर घन, कानन बोले मोर। मेघन की नभ गर्जना, करे बीजुरी शोर।। रिमझिम की बरसात से, मौसम बदले रंग। प्रेम रंग के रंग में, उठती बहुत तरंग।। विरहा के तन पर पड़े, शीतल मंद फुहार। अगनि फुहारों से...

सुरेश कविराय के दोहे "आत्म समर्पण"

समर्पण दोहावली सादर नमन। मेरी नई काव्य-कृति 'समर्पण दोहावली' आप सभी सुधी पाठकों और साहित्य-प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है। प्रकृति के त्याग, निस्वार्थ अर्पण और आत्मा के विसर्जन के गहरे भावों को समेटती यह दोहावली आज इस गरिमामयी डिजिटल मंच पर साझा करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, समर्पण के ये सरल भाव आपके अंतर्मन को स्पर्श करेंगे। प्रस्तुत काव्य कृति समर्पण को आप अपनी प्रतिक्रियाओं और स्नेह से अवश्य अनुग्रहित करें। सादर! आत्म समर्पण भाव से, ईश मिलन के लेख। शक्ति समर्पण से मिले, बनते लेख सुलेख।। रुकी नहीं सरिता कहीं, चले किनारे साथ। सरिता सागर में मिली, साहिल हुए अनाथ।। चप्पल जैसी को सखी, हर पथ रहती साथ। काँटे कंकड़ से छिले, छिन्न भिन्न है गात।। दीपक बाती तेल की, मिलती नाँहि मिसाल। अंग जलाकर दे रहे, जोत भंगिमा लाल।। चंदन तन शीतल करे, निज तन का बलिदान। चंदन के बलिदान से, बनती महक महान।। धूप तपन दे अग्नि सी, शीतलता दे रात। साथ चले साया सदा, अभ्र करे बरसात।। कश्ती की भी आतमा, तुच्छ एक पतवार। खेवन हारा ही करे, नै...

सुरेश कविराय के दोहे "समसामयिक चुनौतियाँ"

काव्य-सप्तक: बदलते दौर और समसामयिक चुनौतियाँ 1. तकनीकी बदलाव और संक्रमण काल परिवर्तन के दौर में, छूटी कलम दवात। तकनीकी विकसित हुई, चलना होगा साथ।। 2. लेखकों का ऐतिहासिक गौरव और अस्त्र लेखे लेखक ने लिखे, वही बना इतिहास। कागज कलम दवात ही, अस्त्र आपके खास।। 3. शोधपरक लेखन और सामाजिक प्रामाणिकता शोध करे पाछे लिखै, लेखन नहि आसान। दर्पण है संसार का, लेखन काम महान।। 4. बदलते गणतंत्र में शिक्षा की अनिवार्यता बदल रहा सब तंत्र है, बदल रहा गण तंत्र। शिक्षा ही वरदान है, नहीं काम के मंत्र।। 5. व्यावहारिक संकट और लाचार व्यवस्था महँगाई की आजकल, बहुत बड़ी रफ़्तार। राजतंत्र पन्गू हुआ, सत्ता है बीमार।। 6. शिक्षा का बाज़ारीकरण और युवा संघर्ष अतिवादी सरकार ने, शिक्षा की बर्बाद। छात्र सड़क पर आगये, पूँजीपति आवाद।। 7. एक लेखक का धर्म सत्ता करती आज कल, तीखा तेज प्रहार। लेखन अपना धर्म है, मानो मत ना हार।। 8. कवि की भणित और लोक-सत्य की घोषणा नौटंकी सरकार की, चारों और कलेश। सत्ता बेईमान है, सच्ची लिखी सुरेश।। #सुरेश #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #...

सुरेश कविराय के दोहे "बचपन"

काव्य-सप्तक: बालपन और विद्यालय की स्मृतियाँ 1. जीवन की उर्वरा भूमि बचपन के स्कूल भी, उत्तम उर्वर खेत। जीवन की संभावना, विद्यालय की रेत।। 2. अक्षरारंभ और कौतूहल बचपन के कौतुक बड़े, पकड़ी हाथ सलेट। अक्षर लिखने के लिए, खड़िया से की भेट।। 3. बस्ते का बोझ और मस्ती का सामंजस्य वस्ते के भी साथ में, मस्ती मगन मतंग। पट्टी इक हथियार थी, रहती सबके संग।। 4. मध्यांतर (इंटरवल) और सामूहिक आनंद आधी छुट्टी का समय, बजती घंटी रोज। खाना कम मस्ती घनी, सब बच्चन की मौज।। 5. सावन, तालाब और कागज़ की नावें कागज की वे कश्तियाँ, जब छोड़ी तालाब। दूर नाव तट से हुई, खुशियों का सैलाब।। 6. बाल-मन की बेफिक्री और तरलता सावन की बौछार हो, या हो बहता नीर। मस्ती मन की कामना, बचपन कब गंभीर।। 7. विद्यालय का आंचल और वात्सल्य बचपन की उस धूल में, छुपा हुआ था प्यार। विद्यालय के वक्ष ही, बचपन के संसार।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #दोहाछंद

सुरेश कविराय के दोहे बदलते दौर और समसामयिक चुनौतियाँ

बदलते दौर और समसामयिक चुनौतियाँ 1. तकनीकी बदलाव और संक्रमण काल परिवर्तन के दौर में, छूटी कलम दवात। तकनीकी विकसित हुई, चलना होगा साथ।। 2. लेखकों का ऐतिहासिक गौरव और अस्त्र लेखे लेखक ने लिखे, वही बना इतिहास। कागज कलम दवात ही, अस्त्र आपके खास।। 3. शोधपरक लेखन और सामाजिक प्रामाणिकता शोध करे पाछे लिखै, लेखन नहि आसान। दर्पण है संसार का, लेखन काम महान।। 4. बदलते गणतंत्र में शिक्षा की अनिवार्यता बदल रहा सब तंत्र है, बदल रहा गण तंत्र। शिक्षा ही वरदान है, नहीं काम के मंत्र।। 5. व्यावहारिक संकट और लाचार व्यवस्था महँगाई की आजकल, बहुत बड़ी रफ़्तार। राजतंत्र पन्गू हुआ, सत्ता है बीमार।। 6. शिक्षा का बाज़ारीकरण और युवा संघर्ष अतिवादी सरकार ने, शिक्षा की बर्बाद। छात्र सड़क पर आगये, पूँजीपति आवाद।। 7. एक लेखक का धर्म सत्ता का भी आज कल, लेखन पर परहार। लेखन अपना धर्म है, मानो मत ना हार।। 8. कवि की भणित और लोक-सत्य की घोषणा नौटंकी सरकार की, चारों और कलेश। ...

✍️ काव्य-सप्तक: लेखक का धर्म और साधना सुरेश कविराय

✍️ काव्य-सप्तक: लेखक का धर्म और साधना 1. मार्गदर्शक और संकट-नाशक भूमिका दिशा दिखाती जग चले, लेखक की हर चाल। चिंतन से चिंता कटे, कटे कष्ट हर हाल।। 2. सत्यनिष्ठा और वैचारिक सजगता सत्य हमेशा जो लिखे, भाव रहे निष्पक्ष। कलम सिपाही देश की, एक चेतना लक्ष।। 3. निरपेक्ष साधना और वैचारिक स्वतंत्रता लेखक तो लिखता रहे, तजकर पक्ष-विपक्ष। लेखन है इक साधना, लिखना है निष्पक्ष।। 4. मौलिकता और व्यावसायिकता का विरोध भीड़-भाड़ के शोर में, अपनी मौलिक सोच। मोल नहीं बाज़ार में, वह लेखक सर्वोच्च।। 5. ज्ञान का सरलीकरण और बौद्धिक शुद्धता गूढ़ बात विज्ञान की, सहज सरल आधार। लेखक ऐसे चाहिए, जिनके शुद्ध विचार।। 6. तार्किक विस्तार और गंभीर समीक्षा तर्क शक्ति विस्तार से, लिखना होगा और। लेखक के हर लेख पर, करना होगा गौर।। 7. इतिहास के संरक्षक और कालजयी स्वर युगों युगों तक गूंजती, भूत देत आवाज। लेखक तेरे लेख ही, भूतकाल के राज।। #सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #हिंदी #छंददोहा

सुरेश कविराय के दोहे । 🌟 संत कबीर-(सप्तक) 🌟

किताबी ज्ञान से परे, जिन्होंने अनुभव के सच से समाज को जगाया। अपनी वाणी को शमशीर और प्रेम को ही एकमात्र संदेश बनाया। महासंत कबीरदास जी के उसी निर्भीक और सूफी दर्शन को समर्पित मेरी एक छोटी सी दोहावली—'कबीर-सप्तक'। 🌟 संत कबीर-(सप्तक) 🌟 1. कबीर का प्रेम संदेश (वैश्विक रूप) लेखा लेख कबीर का, लिखा प्रेम संदेश। आज कबीरा आपको, नमन करे हर देश।। 2. पाखंड पर प्रहार (विद्रोही रूप) काजी पंडित कांपते, साँची बात कबीर। वाणी से घायल किया, शब्द बने शमशीर।। 3. साधना और शब्द-अस्त्र शास्त्र नहीं थी साधना, दूर किया पाखण्ड। शब्द अस्त्र थे आपके, घायल सकल घमण्ड।। 4. ज्ञान का सागर ज्ञान सिंधु वैराग्य के, अनुपम लेख कबीर। अज्ञानी ज्ञानी हुए, सुन साखी गंभीर।। 5. मान-अपमान से ऊपर (संसार बनाम प्रेमी) वैसे तो संसार में, बड़ा बहुत सम्मान। प्रेमी जन डरते नहीं, घोर मिले अपमान।। 6. प्रेम की लौ और दुनिया का ताना जग कहता जिसको बुरा, प्रेमी को वो मान। लौ ल...

सुरेश कविराय के विविध दोहे

१. प्रकोप दहक रहा सूरज बहुत, अग्नी जैसी धूप। बादल नभ दीखें नहीं, नीर नहीं नलकूप।। २. चुनौती अनिल अनल सी लग रही, गर्मी महा प्रचंड। मही मेघ से कह रही, तोड़ो आन घमण्ड।। ३. संकट सर सरिता सब सुखतीं, गर्मी है विकराल। बोतल में पानी बिके, ये भी बड़ा सवाल।। ४. चेतावनी ताप मान भू पर बढ़ा, खतरा एक प्रकार। तपती वसुधा कह रही, सुनलो करुण पुकार।। ५. समाधान पेड़ लगाओ भूमि पर, मत कर तनिक अबेर। तापमान काबू रहे, मत मुख अपना फेर।। #सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #छन्दहिंदी #दोहा

सुरेश कविराय के दोहे "पदानुक्रम"

पदानुक्रम मूल्यवान हर जीव है, समझो इसका मोल। पाँच अवस्था जीव की, हिये तराजू तोल।। भूख प्यास निज आसरा, जीवन का है मूल। दूजा सुख संभावना, जीवन के अनुकूल।। प्रेम राग अनुराग की, मिले तीसरी खेप। पावे सुख परिवार का, निज जीवन संक्षेप।। जीवन की पहिचान को, महनत ही वरदान। खपा दिया तन आपना, जग पाया सम्मान।। खाया पीया चल दिये, ये छोटी है बुद्धि। लौटाने को जो चले, वे नर आत्म सिध्दि।। शिखर चेतना जीव की, कर्म सकल प्रतिबोध। आत्मबोध अमोल है, कुल जीवन का शोध।। #सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #हिंदी #छंद #दोहा

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

नारी धीरज धर्म ही, होते सच्चे मित्र। उदासीन मन में भरे, फटे पुराने चित्र।। फटे पुराने चित्र, बहुत पीड़ा पहुँचाते। बुरा लगे संगीत, गीत भी खूब रुलाते।। ज्ञान सुरेश निदान, रात काली अँधियारी। वक्त बुरे में नेक, ज्ञान देती निज नारी।। अच्छे सच्चे मित्र अब, विरले हैं जग माँहि। कोमलता जाती रही, बची मधुरता नाँहि।। बची मधुरता नाँहि, कुटिलता भारी मन में। करके भी शृंगार, अगिन लगती है तन में।। मित्र हुए कमजोर, बहुत देते हैं गच्चे। माने आज सुरेश, मित्र कम अच्छे सच्चे।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #छंद #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

मंज़िल दर मंज़िल मंज़िल दर मंज़िल चला, लगी न मंज़िल हाथ। एक नाम संसार में, नाम चलेगा साथ।। नाम चलेगा साथ, साथ मंज़िल तक जाये। दूजा नहीं उपाय, नहीं मंज़िल मिल पाये।। कहि सुरेश कविराय, नहीं होगा कुछ हासिल। जपले हरि का नाम, मिलेगी निश्चित मंज़िल।। मंज़िल में वाधा बनें, लोभ मोह सुख चंद। नाम उतारे पार भव, अमित भाव स्वच्छंद।। अमित भाव स्वच्छंद, अकेला एक सहारा। राम नाम की नाव, मिलेगा आप किनारा।। कहि सुरेश कविराय, नदी के साथी साहिल। साहिल दोनों साथ, मिली सरिता को मंज़िल।। #सुरेशकविराय   #हिंदीछंद   #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय के मुक्तक

हजारों ख्वाइशें मेरी मगर अब एक वाकी है। मचलते आज पैमाने मगर हमराज साकी है। बहुत बेफिक्र मयखाने, बिखरते आज पैमाने। मगर घट मै अटकती है कि जीवन एक झाँकी है।। #सुरेशकविराय ₹हिंदी #छंद #मुक्तक ₹बहरेहजज

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

रखना होगा फ़ासला, जीव जगत के बीच। देख अमर है आतमा, देह जगत नवनीच।। देह जगत नवनीच, मरम वैरागी जाने। एक जगत वैराग्य, न बिल्कुल मन की माने। कहता खरी सुरेश, रूह के माफिक चलना। निकट रहे वैराग्य, दूर इस मन को रखना।। इच्छाएं पुरजोर हैं, द्रण निश्चय कमजोर। होगी पूरी कामना, और लगाले जोर।। और लगाले जोर, अंत में जीत मिलेगी। द्रण निश्चय वरदान, कली बन फूल खिलेगी।। देख सुरेश महान, चाँद की चंद्र कलायें। द्रण निश्चय ले ठान, पूर्ण हों सब इच्छाएं।। #सुरेशकविराय   #छंद   #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय के "मुक्तक"

।। मुक्तक ।। न ढलती शाम की सर्दी, न चढ़ती धूप की गर्मी, सुहाना अब नहीं मौसम, हवाएं भी नहीं मर्मी। बाहरें भी करें ज़ख़्मी, घटायें भी डरातीं हैं।, जुदा जज्वात हर मुझसे, जुदा है मोम की नर्मी।। चमकना है अगर तुमको तो जलना सीख लो। चलोगे बाद में पहले तो गिरना सीख लो। दिखेगा स्वर्ग भी पहले तो मरना सीख लो महकना है अगर तुमको तो खिलना सीख लो। #सुरेशकविराय   #हिंदीछंद   #मुक्तक

सुरेश कविराय की गजल "अगर मैं प्यार का सागर"

अगर मैं प्यार का सागर", नदी तू भी दिवानी है। घटा को घाट तक लाकर, लुटा जाती जवानी है।। अजब हैं प्यार के किस्से, बना कविता सुनाता हूँ। मधुर था नीर सरिता का, मिलत खारी रवानी है।। जहाँ से सार में आयी, किनारे संग साये थे। चली जब छोड़के साहिल, पड़ी निजता गवानी है।। नदी पीती नहीं पानी, तरुवर फल नहीं खाते। भला इनसे बड़ा कोई, मुझे दीखे न दानी है।। मिलेंगें सिंधु में मोती, उदर में सीप के पलते। जलधि का जल नही पीती, गरभ स्वांती समानी है।। धरा देती सहारा है, शशी शीतल करे मन को। दिवाकर जान देता है, किरन भी खानदानी है।। सुधा के ध्यान बैठा हूँ, सुरा का पान करता हूँ। जिगर जो पीर बैठी है, सुरेशा के दवानी है।। #सुरेश~   #सुरेशकविराय   #गज़ल   #सुरेशचंद्रा

सुरेश कविराय की कविता "अनंत" मन राजा संसार सकल का

अनंत मन राजा संसार सकल का, धन दौलत जागीर नहीं है। कोई बंधन बाँध न पाये, बनी कड़ी जंजीर नहीं है।। मन को तिल भर चैन नहीं है, फिर भी तू बेचैन नहीं है।। शलभ गगन में मंजिल ढूँढ़े, लेकिन डोरी संग नहीं है। बेशक उच्च शिखर पालेगा, पर बच पाये अंग नहीं हैं।। मन को तिल भर चैन नहीं है, फिर भी तू बेचैन नहीं है।। सरिता सागर संग समाये, साहिल कहते सही नहीं हैं। नहीं शेष अवशेष नदी का, पीर नदी ने कही नहीं हैं।। मन को तिल भर चैन नहीं है, फिर भी तू बेचैन नहीं है।। अहंकार पर्वत सा भारी, किन्तु अहम में भार नहीं है। गगन अनंत कहा जाता है, अंबर का आधार नहीं है।। मन को तिल भर चैन नहीं है, फिर भी तू बेचैन नहीं है।। वक्त बुरे की भी परिसीमा, कटती काली रैन नहीं है। घटा चीर कर गिरी चंचला, घाव गर्भ भू बैन नहीं हैं।। मन को तिल भर चैन नहीं है, फिर भी तू ...

सुरेश कविराय के दोहे ।। वैराग्य ।।

।। वैराग्य ।। दर्शन इक वैराग्य है, मनोभाव का त्याग। जगत विसारे भी नहीं, नहीं स्वर्ग का राग।। अंतर में वैराग्य की, नियमित चलती खोज। वात जगत की में बहे, जल में फूल सरोज।। कौन कला वैराग्य में, दिव्य तत्व का ज्ञान। उदासीन सम्मान से, सुखद लगे अपमान।। राज्य एक वैराग्य है, बिन राजा का राज। कंचन माटी एक सी, वैरागी का ताज।। अंतर्मन खाली करो, बचे नहीं अवशेष। अब कोई चिंता नहीं, नहीं कामना शेष।। वास नगर वनवास में, या हो शून्य निवास। शांति महा अनुराग में, मन मोहन का दास।। प्रेम एक वैराग्य का, है अच्छा पर्याय। त्याज्य वासना आपनी, उत्तम एक उपाय।। नेक सुरेश विराग से, शांति मिले भरपूर। रिक्त रहे अतिरिक्त से, अनुपम महक कपूर।। #सुरेशचंद्रा   #सुरेशकवीरा   #हिंदीछंद   #दोहा

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ ।। सम्मान और अपमान ।।

।। सम्मान और अपमान ।। आगे आगे सम्मान है, पीछे है गुणगान। फिर भी इनके बीच में, घुस आया अपमान।। घुस आया अपमान, पड़ा दोनों पर भारी। रूठ गया सम्मान, मान की होती ख्वारी।। कहि सुरेश कविराय, मान के खुलते धागे। झेल सके अपमान, वही नर सबसे आगे।। #सुरेशकविराय   #हिंदीछंद   #कुण्डलियाँ

।। ताकत हैं शतरंज की ।। सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

।। ताकत हैं शतरंज की ।। ताकत हैं शतरंज की, राजा और वजीर। बे-मकसद की जिंदगी, जब मर जाय ज़मीर।। जब मर जाय ज़मीर, होय जीवन की हानी। बे-ग़ैरत के लोग, अजब सी बने कहानी। कहि सुरेश कविराय, जीव की होती बेगत। सेना का ही सोर्य, देश की होती ताकत।। #सुरेशकविराय   #हिंदीछंद   #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय की दोहावली "।। ज्ञान-रत्न दोहावली ।।"

।। ज्ञान-रत्न दोहावली ।। ज्ञान स्रोत है शक्ति का, प्राण समान चरित्र। ज्ञान ज्योति ब्रह्मांड में, महक रही बन इत्र।। पन्ना माणिक रत्न हैं, सोना चाँदी तत्व। अवयव आते जात हैं, ज्ञान बने अस्तित्व।। नीलम हीरा के लिए, दान दिया पुखराज। मोती मन का चंद्रमा, जान रतन के काज।। ग्रह योग ब्रह्मांड का, करते हैं निर्माण। रतन रखें समरूपता, करने को कल्याण।। ज्ञानी ने पहचान कर, रतन लिए नव खोज। रतन ग्रहों का तत्व हैं, ज्ञानी फूल सरोज।। रतन बहुत नकली मिलें, रखना ध्यान हमेश। पंडा पाजी हो गए, काज़ी बुरे विशेष।। ज्ञानी के भी ज्ञान से, करना तर्क सुरेश। रत्नों का बाज़ार अब, लालच का परिवेश।। #सुरेशकविराय   #हिंदी   #दोहा   #छंद

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ "सबसे ऊँची दोस्ती"

सबसे ऊँची दोस्ती सबसे ऊँची दोसती, मोल बड़ा अनमोल। हीरे उड़त उगार में, क्या सोने का मोल।। क्या सोने का मोल, लुटाये माणिक पन्ना। प्रेम नहीं व्यापार, सेठ क्यों बनना धन्ना। ऊँचे नीचे भाव, शुरू होते हैं तब से। अच्छा नाँहि सुरेश, बुरे दिन वे ही सबसे।। #सुरेशकविराय   #हिंदी   #छंद   #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय के दोहे "नैन"

नैनन की अनुकूलता, नैनन के अनुकूल। नैनन को भाये नहीं, जो दीखे प्रतिकूल।। नैना मेरे बाबरे, बहते हैं दिन रात। वजह एक अपनत्व है, जो नहि छोड़ा जात।। दुश्मन अपने ही भये, छोड़ चले कहि दूर। आँसू मेरी आँख के, हुए बहुत मजबूर।। कुछ तो ऐसी बात है, हूँ जिससे लाचार। आँसू मेरी आँख के, गिर करते प्रतिकार।। पढ़कर ये संदेश मैं, लिखने को मजबूर। नैनन को समझाइये, आकर आप हुज़ूर।। दिल तेरा पत्थर हुआ, मैं नाजुक हूँ काँच। टूट जाय कटु बोल से, नहीं साँच को आँच।। मन ऐसे ही भाव हैं, मिलें न और उधार। जैसा था वैसा लिखा, अच्छा या बेकार।। #सुरेशकविराय   #हिंदी   #दोहा

सुरेश कविराय की दोहावली "अविचल साथ"

अविचल साथ (सुरेश की कलम से) सुविधा से पथ को चुने, वो फिर कैसा मीत। साथ चले साथी वही, बेशक जग विपरीत।। जगत सकल छलिया भया, परिचय सी है प्रीत। अपना अपना राग है, लुप्त हुए मनमीत।। रुकी नहीं सरिता कहीं, चले किनारे साथ। सुविधा भोगी प्रेम है, साहिल हुए अनाथ।। चप्पल जैसी को सखी, हर पथ रहती साथ। काँटे कंकड़ से छिले, छिन्न भिन्न है गात।। दीपक बाती तेल की, मिलती नाँहि मिसाल। अंग जलाकर दे रहे, जोत भंगिमा लाल।। चंदन तन शीतल करे, निज तन का बलिदान। चंदन के बलिदान से, बनती महक महान।। धूप तपन हो अग्नि सी, या पूनम की रात। साथ चले साया सदा, अभ्र करे बरसात।। कश्ती मेरी आप हो, तुच्छ एक पतवार। खेवन हारे आप हो, नैया कर भव पार।। साँस साँस में नाम हो, मृदु स्वर हो संगीत। कली अली सम संग हो, अधर मनोहर गीत।। पुष्प चढ़े सिर ईश के, तबहू संग सुगंध। गगन उड़े स...

सुरेश कविराय के दोहे ।। पाषाण और परमात्मा ।।

'पाषाण और परमात्मा' शीर्षक दोहा-शृंखला यहाँ प्रस्तुत है, जो शिल्पकार और पाषाण के माध्यम से ईश्वर व इंसान के अंतर्संबंधों को दर्शाती है। यह काव्य रचना पत्थर की मूरति में भगवान के वास, शिल्पकार के महत्व और मानव के मन में व्याप्त नफ़रत पर आधारित है। ।। पाषाण और परमात्मा ।। पत्थर को भगवान का, देता रूप बनाय। ऐसी अद्भुत साधना, जग में दूजी नाय।। शिल्पकार के शिल्प को, मिला नहीं सम्मान। पाखण्डी पाखण्ड कर, बन बैठे भगवान।। को पत्थर भगवान है, किस कण कण में प्राण। केवल करुणा भाव में, मिलते हैं भगवान।। नफ़रत वश पागल हुए, पत्थर मारे शीष। ईश नहीं पाषाण में, अर्थहीन आशीष।। पत्थर तो भगवान है, पत्थर दिल इंसान। मंदिर ही पाखण्ड का, बना दिया स्थान।। मन मंदिर है ईश का, कहते पीर सुजान। पत्थर में भगवान हैं, नहि माने विज्ञान।। नफ़रत मन से त्याग दो, कहता कवी सुरेश। सूरज चंदा भूमि ही, बृह्मा विष्णु महेश।। ...

सुरेश कविराय के दोहे "परिचय और पहचान"

परिचय और पहचान परिचय तो है आवरण, मूल तत्व अस्तित्व। व्यक्ती की पहिचान से, बनता है व्यक्तित्व।। अंतर को पहिचान ले, परिचय नहि पहिचान। रूप नवल श्रम शक्ति का, पहचान नहीं आसान।। परिचय बस इक पुष्प है, गंध सुगंध सुजान। बीज मिटे अंकुर बने, कठिन डगर पहचान।। परिचय दीपक ज्योति का, रोशन करे जहान। तेल जले बाती जले, ज्योति बने पहचान।। साहिल परिचय प्रेम के, दोनों सरि की जान। मृदु जल सरि का क्षीर है, लुप्त हुई पहचान।। परिचय को पहचान ही, देती है विस्तार। परिचय के अस्तित्व का, पहचान बने आधार।। #सुरेशकविराय   #सुरेशचंद्रा   #ग़ज़ल

सुरेश कविराय की ग़ज़ल,लिखूँ मैं दास्ताँ अपनी

लिखूँ मैं दास्ताँ अपनी, किसी सूखी सिहाई से, सजे थे स्वप्न आँखों में, मगर बिखरे जुदाई से।। शिकायत भी करूँ किससे, जुदा है जिंदगी मुझसे, खफ़ा जब ईश ही मुझसे, नयन सूखे विदाई से।। हवा लगती नहीं शीतल, न पर्वत हौसला देते, उभर आए जखम दिल के, नहीं भरते दवाई से।। न कोई ख्वाब आँखों में, न छत पर चाँद आता है, गगन में डूब जाता हूँ, बचूँ मैं जग हँसाई से।। नज़र में एक ही मंज़िल, ग़ज़ल का थाम लूँ दामन, सुरेशा दास्ताँ लिखता, ग़ज़ल की रहनुमाई से।। १२२२, १२२२, १२२२, १२२२ #सुरेशचंद्रा   #सुरेशकविराय   #ग़ज़ल

सुरेश कविराय की ग़ज़ल "छंद की संतान"

तितलियाँ उड़तीं चमन में, बाग की पहिचान है। खुश बहारें बाग में, गुल बाग का वरदान है।। महकता गुल बाग में, देता सदा संदेश ये। जिंदगी गुलशन बने, ये जिंदगी मेहमान है।। प्रेम की सरिता दिवानी, जा मिली है क्षीर में। रो रहे साहिल खड़े, मृदु नीर का नुकसान है।। आतमा इसकी बहर पर, जिंदगी अरकान हैं। नाम बेशक है गज़ल पर, छंद की संतान है।। है गज़ल की धार पावन मौशिकी है रूह की। बद्र की सी रात शीतल आदमी अंजान है। नैन पैमाने बने, साकी बनी है दिलरुबा। मय अधर मसरूर है पर मयकदा हैरान है।। #सुरेश_चंद्रा   #सुरेशकविराय   #हिंदी   #छंद

प्रकृति गान सुरेश कविराय

शैल-शिखर-नभ-पवन-प्रदाइन पालक भूमि विधाता हिमगिरि विंध्य अरावलि पर्वत सिन्धु नर्मदा गंग: जल नीलांबर मरुथल सुंदर उज्ज्वल नव निधि रंग: सत शुचि जगत निहारे, सब ऋतु चक्र पुकारे धानी चोला गाता। सकल सृष्टि जग मंगलदायक पालक भूमि विधाता। शुचि दे शुचि दे शुचि दे शुचि शुभ सुख गति दे।। कानन-कुंज-घने अति सुंदर भू को स्वर्ग बनाता मधुकर गुंजन खग-कुल कलरव गान मनोहर गूंजे सर सरिताएँ स्रोत नीर की सलिल कमल दल फूले मोहित सुर नर सारे, शोभा जगत निहारे प्रकृति जगत की माता सकल सृष्टि जग मंगलदायक पालक भूमि विधाता शुचि दे शुचि दे शुचि दे शुचि शुभ सुख गति दे।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #प्रकृतिगान 

सुरेश कविराय के दोहे

तृप्त कौन संसार में, नहि बुझती है प्यास। जोगी भोगी एक से, स्वाति बूंद की आस।। पिया मिलन की आस मन, मन में उठत उमंग। बेसक तन से दूर मैं, मन प्रीतम के संग।। मोह जगत इक फ़ांस है, मोह चले विपरीत। मिलने का मन मोह है, मोह जगत की रीत।। त्यागूं कैसे मोह को, मोह रूह का नूर। पास हमारे मोह है, प्रीतम मुझसे दूर।। नहीं पता मुझको दिया, दिल मेरा मजबूर। मन ही मेरा आसरा, लेगा ढूंढ जरूर।। विरहा के मन की दशा, बिगड़े बिन पैगाम। रोम रोम में ढूंढती, एक यही बस काम।। माया के बस साजना, मोय किया बदनाम। रात कटे ना दिन मिरा, रोऊँ आठों याम।। तड़प रही है आतमा, नैनन बहता नीर। साजन तेरी याद में, उठे कलेजे पीर।। मिलने की मन कामना, मत कर तनिक अबेर। हीये की आवाज सुन, सुन साजन ले टेर।। #सुरेश_चंद्रा #हिंदी_साहित्य #कलम_की_ताकत #साहित्य_साधना #KaviSammelan #HindiVishwa

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

जाकौ मन चित शुध्द है, वही निभावे फ़र्ज़। मात पिता के फ़र्ज़ कौ, संतित के सिर कर्ज़।। संतित के सिर कर्ज़, चुकाये सो बढ़ भागी। कर सेवा सत्कार, मुक्ति ऋण से मिल जागी।। कहि सुरेश कविराय, काज न बिगरे बाकौ। मानव वही महान, फ़र्ज़ निभतौ है जाकौ ।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #कुण्डलियाँछंद

सुरेश कविराय के दोहे, धनतेरस त्यौहार

धनतेरस धनतेरस धन धान्य से, कबहु न करे निराश, धन वैभव सुख सम्पदा, सदा रहे मम पास।। धनतेरस को धन मिले, लक्ष्मी करे निवास, पूरी करना कामना, मत कर मात निराश।। धनतेरस की धारणा, धन मत देउ उधार, वस्तु नई घर लाइये, सुखी रहे परिवार।। धनतेरस का है दिवस, धन से हो सम्मान, निर्धन का होता रहे, जीवन भर अपमान।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #हिंदी #दोहा

दीवारों पर दाग धुँये के, किंचित मन रंजित है मेरा।

दीवारों पर दाग धुँये के, किंचित मन रंजित है मेरा। अरमानों को जला दिया है, रोशन घर करने को तेरा। चुभन काँच की कंचन समझी, स्वर सुंदर संगीत बनाया। नूर वफ़ा का लखि नैनों में, मर्म वफ़ा बन गीत सुनाया। किरत कांच क़िस्मत के लेखे, कांच किरण मणि नूर बिखेरा। अरमानों को जला दिया है, रोशन घर करने को तेरा। तंग गली है बहुत वफ़ा की, दो का रहना है नाकाफी। चिंतन की कोशिश की मैंने, पतला ज्ञान हुआ है काफी। मै का मरना जनम प्रेम का, बिना प्रेम के घोर अँधेरा। अरमानों को जला दिया है, रोशन घर करने को तेरा। अक्स वफ़ा का अंतर्मन में, सूरत दीखत है दरपन में। हरी हिना घिस रक्तवरण दे, करुणा सीरत रहती मन में। मन की गति को मन पहिचाने, जग में जीवन रैन बसेरा। अरमानों को जला दिया है, रोशन घर करने को तेरा। #सुरेशकविराय   #सुरेशचंद्रा   #हिन्दीकविता

नभ अब्र घटा छा जाती है सुरेश कविराय की कविता

जब विरह अनल में जलता मन, संयोग हवा बन जाती है। तपती वसुधा की धड़कन पर, नभ अब्र घटा छा जाती है। है प्रेम पिपासा नैनन में, भीतर से सिंधु उमड़ता है। सावन बरसे कुछ पल लेकिन, आँखों से सदा बरसता है। नैना मूक नहीं रह पाते, पर बात नहीं हो पाती है। तपती वसुधा की धड़कन पर, नभ अब्र घटा छा जाती है। छिपी हुई पावक उर पाहन, मृदु शीतल पवन सुहाती है। आशाएँ जीवित रहतीं हैं, पर अभिलाषा मर जाती है। भूल गयीं हैं राह सदाएं, फिर याद उसी की आती है। तपती वसुधा की धड़कन पर, नभ अब्र घटा छा जाती है। दीपक जलकर करे रोशनी, चल परवाने आ जाते हैं। करने वाले करें मुहब्बत, कुछ जलभुन कर मर जाते हैं। तेल जले दीपक कब जलता, संग जलती केवल बाती है। तपती वसुधा की धड़कन पर, नभ अब्र घटा छा जाती है। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #हिन्दीकविता

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

चौपाटी संसद हुई, चौपट है सब काम। जादूगर को राज दे, भुगत लिया अंजाम। भुगत लिया अंजाम, नहीं बस की है सत्ता। जो था देश महान, उसी की हालत खस्ता। पढ़े लिखे को छोड़, बनाया राजा भाटी। संसद का भी नाम, बदल कर रख चौपाटी।। सारा भारत देख कर, होता है हैरान। कटना जारी वोट का, घटा बहुत मतदान। घटा बहुत मतदान, बहुत खुश सत्ता धारी। लोकतंत्र के साथ, करी भारी गद्दारी। छीन लिया अधिकार, घात कर वोटर मारा। मौलिक था अधिकार, इसी विध लूटा सारा।। #सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #छंद #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

हकमारी को हक कहें, क्या ऐ अच्छा काम? आरक्षण के खेल की, चाल हुई नाकाम। चाल हुई नाकाम, बहुत सत्ता खिशियानी। तनिक नहीं ईमान, करे राजा मनमानी। चला न जादू आज, हुई संसद में ख़्वारी। जनता की आवाज, चले ना अब हकमारी।। ज्ञानी ही अज्ञान का, पढ़ा रहे हैं पाठ। अंधभक्त अंधे भये, हैं पण्डन के ठाठ। हैं पण्डन के ठाठ, मौज भी खूब उड़ाते, माया दे दो मोय, ज्ञान इतना बतलाते। कहि सुरेश कविराय, बनो मत इतने दानी, शिक्षा लो अपनाय, बनोगे तब ही ज्ञानी।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #छंद #कुण्डलियाँ

सुरेश कविराय की ग़ज़ल "रोशन कभी थी ज़िंदगी"

आलाप बहर: 2212 2212 2212 2212 रोशन कभी थी ज़िंदगी महताब का आलाप है। ग़मख़्वार कोई ग़ैर है यह गुफ़्तगू संताप है। झँनकार पायल की कभी संगीत थी मनमीत की। है मौन मौसम मौशिकी खामोश ख़ुद पदचाप है। नगमे मुहब्बत के नये लव चूमते रहते ख़ुदी। लव पर नहीं अब लब्ज इक क्यों लब्ज़ हर चुपचाप है? माना कि उल्फ़त खून है रग की रसिक है आशिकी। क्यों राग अब बेराग है क्या मौशिकी भी पाप है? आँसू बहे अब्सार से उम्मीद क्या ग़मख़्वार से। ये बेखुदी तेरी सुरेशा एक पश्चाताप है। #सुरेशकविराय #सुरेशा #सुरेशचंद्रा #ग़ज़ल

सुरेश कविराय का क्रांतिकारी गीत "नव सृजन होने वाला है"

सृजन की हुंकार कर कलम उठा ले कलमकार, नव रिक्त पृष्ठ बहु भरने को। मशि कागज का अंत न लिखना, अवसान मिला है लिखने को। मेघांत नहीं है वज्रपात, नव सृजन होने वाला है। ख़िज़ाँ गयी नव कली खिलेगी, नव गुंजन होने वाला है। अंत बसंत महक उपवन की, अलि गान मिला है लिखने को। मशि कागज का अंत न लिखना, अवसान मिला है लिखने को। अंधकार में भार नहीं है, केवल सूर्य प्रकाश नहीं है। काली रात उसी को कहते, जिस पल चन्द्र प्रकाश नहीं है। सूर्य किरण हर तम हर लेती, गुणगान मिला है लिखने को। मशि कागज का अंत न लिखना, अवसान मिला है लिखने को। क्षितिज दूर नभ पास हमारे, सिंधु नहीं गागर में रहता। न्यायालय क्यों मौन हुए है? मौन नहीं सागर रह सकता। कलमकार की कलम अस्त्र है, सम्मान मिला है लिखने को। मशि-कागज का अंत न लिखना, अवसान मिला है लिखने को। कर कलम उठा ले कलमकार, नव रिक्त पृष्ठ बहु भरने को। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #हिंदी #गीत

हर शख्त सजा मिल सकती है, सुरेश कविराय का सुंदर गीत

मात मुहब्बत में मिलती है, तैयार कज़ा मिल सकती है। नहीं भरोसा यार वफ़ा का, हर शख्त सजा मिल सकती है। अद आईना बनना होगा, मजनू बन चलता काम नहीं। जैसा रूप अनूप प्रिये का, अंदाज नहीं पैग़ाम नहीं। बनना होगा दर्पण मन का, आजाद रज़ा मिल सकती है। नहीं भरोसा यार वफ़ा का, हर शख्त सजा मिल सकती है। प्रेम दिवानी कहा नदी को, सरिता परिदूषित सारी है। हुई मुहब्बत अब बरसा सी, सरिता की गति पे नारी है। स्वारथ भारी नर नारी पर, तो कहाँ वफ़ा मिल सकती है। नहीं भरोसा यार वफ़ा का, हर शख्त सजा मिल सकती है। रैन - दिवस सी नहीं मुहब्बत, उदय दिवस का अंत रात का। नहीं मिलन मुमकिन दोनों का सानी कोई नहीं साथ का। एक याचना शब की दिन से, क्या एक दफ़ा मिल सकती है? नहीं भरोसा यार वफ़ा का, हर शख्त सजा मिल सकती है। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #हिंदी #कविता

विरह वेदना राधा रानी उद्धव संवाद, सुरेश कविराय की विरह की सजीवतम कृति

वेदना छंद: विधाता 1222, 1222 / 1222, 1222 विरह वेदना का बड़ा ही रोचक प्रसंग है, बहुत भावुक करता है, एकाग्रचित होकर पढ़ें, प्रेम की अश्रुधारा शायद ही रुक पाए। राधे राधे- विरह की वेदना पीड़ा, उरे राधा उरे गोपी। सखा उद्धव सुनो मेरी, कहूँ मैं कृष्ण अव्यापी।। किशन को भूल जाना है, तुम्हें ये ही बताना है। विरह छोड़ो अरे राधे, उसी ने पीर है थोपी।। सुने उद्धव वचन कानो, नयन से नीर वर्षा है। ये पीड़ा प्रेम की उद्धव, विरह मेरी मुमूर्षा है।। हमें तो कृष्ण प्यारा है, नदी हूँ वो किनारा है। विरह संदेश भेजा है, इसी में रूप दर्शा है।। पहुप सब अर्ज सुनलो तुम, विहग तुम भी सुनो आओ। लताओ बीच ना आओ, सखा मम ढूँढ़ कर लाओ।। भ्रमर तुम गान मत गाओ, सखा का राग मत गाओ। तुम्हारा अनुशरण करता, अरे इतना न तड़फ़ाओ।। ये जमुना तू बता मुझको, किधर बैठा मेरा कान्हा। अरे छल कर रहा केशव, तेरे सर का सरक जाना।। कि छल करती है वारी से, मिला मेरे मुरारी से। डुबो आँसू तुझे देंगे, अभी तू बंद कर गाना।। ...

मुझमें शूल है क्या? सुरेश कविराय की ग़ज़ल

1222, 122 तो मुझमें शूल है क्या? ये कोई भूल है क्या? बहुत कांटे लता पर, लता पर फूल है क्या? शकल शीशा न दीखी, सफा कर धूल है क्या? न पत्ते हैं न फल हैं, तो कोई मूल है क्या? न पायल है न बिछुआ, कोई कनफूल है क्या? कोई छाया नहीं है, ये पेड़ बबूल है क्या? मनाया इसलिए ना, समय अनुकूल है क्या? सुरेशा के निकट अब, सभी कुछ स्थूल है क्या? #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #ग़ज़ल

सुरेश कविराय का मशहूर गीत "अरमान"

अरमान गीत: मात्रा अनुबंध 16/16 खुली खुली नीली आँखों में, सब झील शिकारे डूब गये। झुकी झुकी पलकों में सारे, अरमान हमारे डूब गये। तन भी डूबा मन भी डूबा, सब रस रसना में डूब गये। सूरज डूबा चंदा डूबा, सब तारे नभ के डूब गये। भूमण्डल का नूर निछावर, लहरों सँग साहिल डूब गये। झुकी झुकी पलकों में सारे, अरमान हमारे डूब गये। नयनन अंदर सागर बहता, सागर गागर में डूब गये। नैन सरोवर भरी सुरा है, सारे पैमाने डूब गये। मादकता छलकत नैनन से, सारे मयखाने डूब गये। झुकी झुकी पलकों में सारे, अरमान हमारे डूब गये। कली कली की मस्ती डूबी, भौंरन के गुंजन डूब गये। चमन सुमन की हस्ती डूबी, बादल अंजन में डूब गये। मेरी क्या हस्ती बचती है, केशव राधा में डूब गये। झुकी झुकी पलकों में सारे, अरमान हमारे डूब गये। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #गीत

न चीते होते मन के, सुरेश कविराय कुण्डलियाँ

जन जन के अंदर बसे, बड़े-बड़े अरमान, पूरण कब किसके हुये, मिलता नहीं विधान। मिलता नहीं विधान, अजब हैं विधि के लेखे, समय बचे ना नैक, अंत में करै परेखे। कहि सुरेश कविराय, न चीते होते मन के, राम करै सो होय, अधूरे अरमाँ जन के।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #कुण्डलियाँ #छंद

"करुणा-बोध" सुरेश कविराय की दोहावली

॥ करुणा-बोध ॥ दया अहम का मूल है, करुणा सम व्यवहार। दया उच्च का भाव है, करुणा सत्य विचार ॥ करुणा का इंसान की, गति पर पड़े प्रभाव। दया श्रेय की भावना, करुणा सरल स्वभाव ॥ दया आम व्यवहार में, देखी जाती रोज। करुणा सम संवेदना, जैसे फूल सरोज ॥ ऊँच नीच का भाव कुछ, दया करत आ जाय। पर करुणा के भाव से, ऊँच नीच बिगलाय ॥ दया भाव इंसान का, गुण अच्छा है एक। केवल करुणा भाव में, मात्र भावना नेक ॥ मन चंचल ज्यों चंचला, करुणा कसे लगाम। करुणा की कीमत नहीं, मोल न एक छदाम ॥ करुणा मेरी कामना, करुणा करम सुरेश। करुणा सब संसार में, विनती एक महेश ॥ — #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #दोहा

अविचल साथ (सुरेश कविराय की कलम से)

अविचल साथ (सुरेश कविराय की कलम से) सुविधा से पथ को चुने, वो फिर कैसा मीत। साथ चले साथी वही, बेशक जग विपरीत।। जगत सकल छलिया भया, परिचय सी है प्रीत। अपना अपना राग है, लुप्त हुए मनमीत।। रुकी नहीं सरिता कहीं, चले किनारे साथ। सुविधा भोगी प्रेम है, साहिल हुए अनाथ।। चप्पल जैसी को सखी, हर पथ रहती साथ। काँटे कंकड़ से छिले, छिन्न भिन्न है गात।। दीपक बाती तेल की, मिलती नाँहि मिसाल। अंग जलाकर दे रहे, जोत भंगिमा लाल।। चंदन तन शीतल करे, निज तन का बलिदान। चंदन के बलिदान से, बनती महक महान।। धूप तपन हो अग्नि सी, या पूनम की रात। साथ चले साया सदा, अभ्र करे बरसात।। कश्ती मेरी आप हो, तुच्छ एक पतवार। खेवन हारे आप हो, नैया कर भव पार।। साँस साँस में नाम हो, मृदु स्वर हो संगीत। कली अली सम संग हो, अधर मनोहर गीत।। पुष्प चढ़े सिर ईश के, तबहू संग सुगंध। गगन उड़े सँग वात के, संग पुष्प के गंध।। सुरेश सरल है रासता, चलना कर प्रारम्भ। बिन स्याही की कलम से, लिखना कर आरम्भ।। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #दोहा

सुरेश कविराय के दोहे

कठिन समय इंसान को, करता है मजबूत। नूर निखर कर आइगा, मिलते बहुत सुबूत।। कुल कर्षण के काल को, सहज बनाओ योग। द्रष्टा बन कर देख लो, कौन किया सहयोग।। तप कर सोने की चमक, और अधिक बढ़ जाय। जैसे सलिल सरोज को, कबहु डुबो ना पाय।। बुरा वक्त है साधना, काट समय कर जोर। रात स्याह या चाँदनी, निश्चित होगा भोर।। चन्द्र सुरेशा के लिए, सब दिन एक समान। सफ़र सुखद होगा तभी, कम करले सामान।। #सुरेशकविराय #चन्द्रसुरेशा  #सुरेशचंद्रा #दोहा

सुरेश कविराय कविता "द्वंद",खुशी बहुत है नव जीवन में,

खुशी बहुत हैं नव जीवन में खुशी बहुत हैं नव जीवन में, फिर भी बहुत उदासी है। मेरा अंतस रिक्त बहुत है, मन अपना प्रवासी है।। पीड़ा व्यक्त नहीं होती है, शब्द अटक घट जाता है। बेशक महफ़िल सजी हुई है, मन अपना हट जाता है। राग रंग का मंच न भाता, पीड़ा मन की दासी है।। खुशी बहुत हैं नव जीवन में, फिर भी बहुत उदासी है।। एक चंचला नभ में चमके, घटा चीर गिर जाती है। धरती तरस रही बादल को, दामिन तन झुलसाती है। बादल बरसें बेशक भू पर, दामिन रक्त पिपासी है।। खुशी बहुत है नव जीवन में, फिर भी बहुत उदासी है। मेरा अंतस रिक्त बहुत है, मन अपना प्रवासी है।। खुशी बहुत है नव जीवन में, फिर भी बहुत उदासी है। #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #हिंदीकविता

सुरेश कविराय की कविता "शून्य से आगे"

शून्य से आगे निहित निराशा भी आशा में, धूम उठा है हिम खंडों से। नहीं मधुरता है भाषा में, आहत है मन पाखंडों से।। जीवन पर भारी आडंबर, सत्य मृत्यु है डगर अकेली। नीचे धरती ऊपर अंबर, अध सुलझी है एक पहेली।। राज नीति में मठाधीश हैं, साधन बनती आज साधना। संत करें व्यापार भगत से, वैरागी मन भरी कामना।। सर्प विषैला जीव जगत का, मात सर्प को मानव देता। नफरत का है दंश भयंकर, रक्त बहा दामन रँग लेता।। सागर कब कहता गहरा हूँ, आकाश शून्य कहलाता है। नहीं कामना शव की कोई, हर जुल्म सहन कर जाता है।। चंदन जैसा शीतल मन हो, धरती जैसी सहनशीलता। सूरज जैसा तेज सहज हो, चन्द्र सुरेशा उर मानवता।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #चन्द्र_सुरेशा

काव्य-सप्तक: बदलते दौर और समसामयिक चुनौतियाँ सुरेश कविराय

काव्य-सप्तक: बदलते दौर और समसामयिक चुनौतियाँ 1. तकनीकी बदलाव और संक्रमण काल परिवर्तन के दौर में, छूटी कलम दवात। तकनीकी विकसित हुई, चलना होगा साथ।। 2. लेखकों का ऐतिहासिक गौरव और अस्त्र लेखे लेखक ने लिखे, वही बना इतिहास। कागज कलम दवात ही, अस्त्र आपके खास।। 3. शोधपरक लेखन और सामाजिक प्रामाणिकता शोध करे पाछे लिखै, लेखन नहि आसान। दर्पण है संसार का, लेखन काम महान।। 4. बदलते गणतंत्र में शिक्षा की अनिवार्यता बदल रहा सब तंत्र है, बदल रहा गण तंत्र। शिक्षा ही वरदान है, नहीं काम के मंत्र।। 5. व्यावहारिक संकट और लाचार व्यवस्था महँगाई की आजकल, बहुत बड़ी रफ़्तार। राजतंत्र पन्गू हुआ, सत्ता है बीमार।। 6. शिक्षा का बाज़ारीकरण और युवा संघर्ष अतिवादी सरकार ने, शिक्षा की बर्बाद। छात्र सड़क पर आगये, पूँजीपति आवाद।। 7. एक लेखक का धर्म सत्ता का भी आज कल, लेखन पर परहार। लेखन अपना धर्म है, मानो मत ना हार।। 8. कवि की भणित और लोक-सत्य की घोषणा नौटंकी सरकार की, चारों और कलेश। सत्ता बेईमान है, सच्ची लिखी सुरेश।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #दोहा #हिंदीसाहित्य

सुरेश कविराय के बेहतरीन दोहे "गरिमा"

1. गरिमा का मूल संदेश (The Core Message) गरिमा भी इंसान की, खूबी एक विशेष। गौरव है सम्मान है, गरिमा का संदेश।। 2. गरिमा का तेज और व्यापकता (The Radiance of Dignity) गरिमा शोभा शान है, गरिमा सूर्य प्रकाश। मानवता के मूल में, गरिमा करे निवास।। 3. गरिमा और प्रेम का संबंध (The Source of Love and Respect) गरिमा साधन प्रेम का, गरिमा ही सम्मान। गरिमा की महिमा अमित, गरिमा को पहचान।। 4. गरिमा का पावन रूप (The Pure and Modest Character) गरिमा निर्मल नीर है, शीतल करे जहान। गरिमा शील सनेह है, गरिमा लेख विधान।। 5. गरिमा की सार्वभौमिकता (The Universal Right) गरिमा तो हर जीव का, जन्मसिद्ध अधिकार। जाति, धर्म और लिंग का, मिटता आप विकार।। 6. गरिमा और सामाजिक सौहार्द (The Shield against Hatred) गरिमा से संसार में, पनपे नहि विद्वेष। गरिमा यदि जाती रही, नहीं बचे कुछ शेष।। 7. गरिमा और कर्तव्य बोध (The Alertness of Conscience) गरिमा का यह भाव ही, करता रहे सचेत। कर्तव्य निभे सब प्यार से, गरिमा का संकेत।। 8. गरिमा और जीवन का परम लक्ष्य (The Ultimate Welfare) गरिमा मानव के ...

सुरेश कविराय के दोहे

1. युवा शक्ति का गौरव युवा शक्ति है देश की, श्रमशक्ती वरदान। सरहद की रक्षा करे, युवा देश की शान।। 2. विडंबना और बेबसी योगदान हर देश में, युवा करे भरपूर। आज हमारे देश में, हुआ युवा मजबूर।। 3. व्यवस्था की बेरुखी युवा भरोसे राम के, सत्ता सुने न बात। रोजगार मिलता नहीं, बुरे बहुत हालात।। 4. नीति और नियत पर प्रहार भ्रष्ट व्यवस्था हो गयी, आहत हैं सब छात्र। भ्रष्ट नीति सरकार की, कोई नहीं सुपात्र।। 5. युवाओं की हुंकार रोजगार सरकार को, देना होगा खूब। ख़फ़ा युवा है आज का, गया नीति से ऊब।। #सुरेश_चंद्रा #सुरेश_कविराय #हिंदी #दोहा

सुरेश कविराय की कविता "साधना"

साधना शूल बिछे हैं पथ पर मेरे, छाले मेरे पायन में। चलकर मंज़िल पर पहुँचा हूँ, छेद हुए बहु दामन में।। बना खाद मैं नीर बना हूँ, रैन बिताई मधुबन में। आठ पहर खिदमत में बीते, फूल खिले तब आँगन में।। नेक राह पर चलना सीखा, फँसा नहीं मन उलझन में। विषधर बेशक लिपटे रहते, गरल नहीं है चंदन में।। अर्पण खुद को मैं करता हूँ, शीश झुका कर वंदन में। धन्य पिताजी माता मोरी, करूँ आरती प्रतिदिन में।। अंतर्मन को रिक्त किया तब, ज्ञान मिला निज जीवन में। परउपकारी भाव जगा तब, महक उठी है तन मन में।। तेरी रहमत की गाथा है, चमक मिली है कंचन में। कुसुम बिना खुशबू फिर कैसी, ढूँढ रहा हूँ उपवन में।। सुरेश चंद्रा सुरेश कविराय #सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #हिन्दीकविता

ख़िज़ा फ़िज़ा बन जाती है, सुरेश कविराय की कविता "रिमझिम"

भाती रिमझिम बारिस सबको, ख़िज़ा फ़िज़ा बन जाती है। जोवन वसुधा का खिल जाता, मस्त फ़िज़ा खिल जातीं हैं।। झूम उठे तरु-पल्लव सारे, कोयल गाना गाती है। पंख पसारे नाचे मोरा, रिमझिम बारिस आती है।। घटा घिरी है नभ में काली, निशा दिवस पर छाई है। नभ से गिरतीं कोमल बूँदें, शीतलता थल आई है।। गीत मिलन का गाती बूँदें, खुशियाँ नई जगाती हैं। तपती धरती की बाहों में, बूँदें सकल समाती हैं।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #हिंदी #कविता

सुरेश कविराय की नई काव्य-कृति 'समर्पण दोहावली'

सादर नमन। मेरी नई काव्य-कृति 'समर्पण दोहावली' आप सभी सुधी पाठकों और साहित्य-प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है। प्रकृति के त्याग, निस्वार्थ अर्पण और आत्मा के विसर्जन के गहरे भावों को समेटती यह दोहावली आज इस गरिमामयी डिजिटल मंच पर साझा करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, समर्पण के ये सरल भाव आपके अंतर्मन को स्पर्श करेंगे। प्रस्तुत काव्य कृति समर्पण को आप अपनी प्रतिक्रियाओं और स्नेह से अवश्य अनुग्रहित करें। सादर! आत्म समर्पण भाव से, ईश मिलन के लेख। शक्ति समर्पण से मिले, बनते लेख सुलेख।। रुकी नहीं सरिता कहीं, चले किनारे साथ। सरिता सागर में मिली, साहिल हुए अनाथ।। चप्पल जैसी को सखी, हर पथ रहती साथ। काँटे कंकड़ से छिले, छिन्न भिन्न है गात।। दीपक बाती तेल की, मिलती नाँहि मिसाल। अंग जलाकर दे रहे, जोत भंगिमा लाल।। चंदन तन शीतल करे, निज तन का बलिदान। चंदन के बलिदान से, बनती महक महान।। धूप तपन दे अग्नि सी, शीतलता दे रात। साथ चले साया सदा, अभ्र करे बरसात।। कश्ती की भी आतमा, तुच्छ एक पतवार। खेवन हारा ही करे, नैया से भव पार।। साँस साँस में नाम हो, म...

सुरेश कविराय की कविता "तो तक पाती पहुँच न पाती"

मसि अंजन से लिक्खी पाती, तो तक पाती पहुँच न पाती। नैनों से जो आँसू बहते, शुष्क अश्क की धार बताती।। अंतर्मन में मेरे क्रंदन, रोम रोम में है स्पंदन। ख़िज़ा हमेशा को मधुवन में, विरहा का माथे पर चंदन। इस चंदन का विरह हिमाती, पाती मेरी पहुँच न पाती।। राम लिखूँ मैं श्याम लिखूँ मैं, राधा का पैगाम लिखूँ मैं। मीरा की मैं लिखूँ कहानी, जो रानी थी श्याम दिवानी। घट से वाणी निकल न पाती, किसको कहकर भेजूं पाती।। अंतर की पीड़ा में अंतर, आती रहती याद निरंतर। स्पंदन अंतर का रुकता, याद तुम्हारी जब जब आती। नहीं सँदेशा तेरा आता, टेर वहाँ तक पहुँच न पाती।। सुरेश कविराय ₹Sureshchandra #सुरेशकविराय #हिंदी #कविता

सुरेश कविराय का पावस प्रताप (दोहा संग्रह)

पावस प्रताप (दोहा संग्रह) ॐ मंगलाचरण ईश चरण रज वंदना, पावस प्रीति महेश। पावस जीवन-दायिका, लागीं लगन सुरेश।। खंड 1: पावस आगमन और प्रकृति का श्रृंगार रिमझिम जब बरसात हो, भू से उठे सुवास। तरु पल्लव सब झूमते, मन सबके उल्लास।। (1) खुशियाँ आंगन नाचतीं, भू की तृप्त पिपास। मिट्टी से उठने लगी, सौंधी सुखद सुवास।। (2) शीत सरस बौछार से, आया भूमि निखार। नूर भूमि पर आ गया, लेकर मस्त बहार।। (3) नहीं भूमि को चाहिए, कोई मुक्ताहार, जने रतन बहु कोख से, चंदन पुष्पाहार।। (4) शीतल सरस सुहावनी, बहने लगी बयार। शीतल तन मन को करे, रिमझिम बन बौछार।। (5) खंड 2: जीव-जंतु और वन-उपवन की मस्ती कोयल प्यारी कूकती, बैठ पेड़ की डार। मोर मस्त वन नाचते, मन में मेघ पुकार।। (6) बारिश का मौसम सुघड़, मोर नाचते बाग। पानी से लबरेज हैं, सरि सर और तडाग।। (7) नभ गरजे घनघोर घन, कानन बोले मोर। मेघन की नभ गर्जना, करे बीजुरी शोर।। (8) मस्ती की अठखेलियाँ, मिलती नहीं उधार। रिमझिम बारिस बन गयी, मस्ती का आधार।। (9) खंड 3: मानवीय भावनाएँ और विरह-प्रेम रिमझिम की बरसात से, मौसम बदल...

सुरेश कविराय के सुंदर दोहे "भूमि"

भूमी से भगवान का, है प्यारा संबंध। ईश्वर अंस जमीन का, अंग संग अनुबंध।।१।। कृष्ण राम अवतार का, बनी भूमि ही केंद्र। अंस भूमि उपयोग से, हार गए खुद इंद्र।।२।। पांच तत्व निर्माण के, भूमी उनमें एक। ईश्वर के अवतार के, लेखे लेख अनेक।।३।। बिना भूमि के भूमि पर, संभव नहि अवतार। सीता मैया भूमि का, रूप बनी साकार।।४।। वक्ष वृहद है भूमि का, करे नहीं प्रतिरोध। भूमि गर्भ में संपदा, होत निरंतर शोध।।५।। जोरू और जमीन के, झगड़े बढ़े तमाम। साथ भूमि किसके गयी, छोड़ चले बलराम।।६।। धरती ने हर आपदा, का कीया सम्मान। मान और अपमान सब, भू को लगे समान।।७।। मैला आँचल हो रहा, देखो नज़र पसार। भूमि एक वरदान है, जीव जगत का सार।।८।। धरती माँ के प्रेम ने, प्रहरी दिया बनाय। मैं भू की रक्षा करूँ, अपना रक्त बहाय।।९।। धरती माता आपसे, विनती है करजोर। शील क्षमा माँ दीजिये, मत करना कमजोर।।१०।। भूमी गौरव गान का, खुद ही दस्तावेज। भोजन भूमी दे रही, जैसे सूरज तेज।।११।। सुरेश कविराय #सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #दोहा #हिंदी

सुरेश कविराय की "निर्मला" २०दोहे

सुरेश की निर्मला १. रसना में रसधार हो, मन में करुण पुकार। संयम सँग सदभावना, कभी न होगी हार।। २. पाना तो सौभाग्य है, खोना ही दुर्भाग्य। चेतन से जब चित जुड़े, वो पल है वैराग्य।। ३. मिलने की मन कामना, है मेरे जगदीश। मिला आपसे दीजिये, मुझको दो आशीष।। ४. बिना प्रेम के जीव को, मिले नहीं संतोष। प्रेम सुधा संजीवनी, व्रत पूरण प्रदोष।। ५. कर्म कथा करनी कही, चलो समय के संग। तोर निभे सँग प्रेम की, चढ़े प्रेम का रंग।। ६. गति बेगति बिन प्रेम के, जप तप सब बेकार। प्रेम एक है रास्ता, ईश मिलें कर प्यार।। ७. देख मुहब्बत आज कल, खूब हुई बदनाम। वफ़ा नफा को अब करें, मचा जगत कुहराम।। ८. निश्छल प्रेम प्रभाव का, असर बहुत गंभीर। राधा मोहन प्रेम का, अक्षय एक तुणीर।। ९. प्रेमातुर इक पीर है, कशक सकल प्राचीर। प्रेम विरह पर जा रुके, लगे कलेजे तीर।। १०. भाँति भाँति के रोग हैं, रोगी सब संसार। प्रेमरोग सबसे बड़ा, नहीं कहीं उपचार।। ११. नैनन में सूरत बसी, क्या काशी हरिद्वार। आस मिलन की आपसे, लीला अपरम्पार।। १२. ईश लगन वरदान है, देती दिव्य प्रकाश। दिव्यज्योति है...

खुशुबू बदन की खुद रवा होकर चले, सुरेश कविराय की ग़ज़ल

खुशुबू बदन की खुद रवा होकर चले, अब ये हवा भी आपदा होकर चले। मैं मयकशी के संग में जीता रहा, अब वक्त भी ख़ुद मयकदा होकर चले। इक शोख़ साकी की मुझे दरकार थी, ख़ुद ग़मज़दा थे इब्तिदा होकर चले। किरकिर करे नैनों मिरे बिंदी तिरी, गिरते हुए हम बाफ़िदा होकर चले। अखनूर तुम बा-नूर हो रहमे करम, तुम ज़िंदगी मेरी फ़िदा होकर चले। सिंदूर तेरी माँग का बन कर सदा, हम संग में बाक़ायदा होकर चले। नैनन मिरे जो पीर है बहती बहुत, अब अश्क भी मेरे ज़ुदा होकर चले। इक प्रीति थी तेरी कशक देती रही, क्यों रात दिन से अलहदा होकर चले? तुझको तजुर्बा भी रुलाने का बहुत, हमको रुला कर के विदा होकर चले। हम आँशुओं को प्यास में पीते रहे, आशिक़ मगर तेरे सदा होकर चले। अब भी सुरेशा वायदे पर है अडिग, हम आज भी इक वायदा होकर चले। #सुरेश_कविराय #Sureshkaviray #gazal #shayeri

सुरेश कविराय की ग़ज़ल, चाहकर भी भूलना ये बात कुछ अच्छी नहीं,

चाहकर भी भूलना ये बात कुछ अच्छी नहीं, चाँद पूरा नभ खिले पर रात कुछ अच्छी नहीं। अभ्र में काली घटायें हो रहीं बेताब सी, मास सावन का झरे वर्षात कुछ अच्छी नहीं। माँगना अच्छा नहीं पर साथ की दरकार है, प्यार की बस लालसा खैरात कुछ अच्छी नहीं। गम बहुत मुझको दिया है दिल बहुत बेजार है, याद हीं अब शेष हैं सौगात कुछ अच्छी नहीं। शुष्क है वीरान दिल मौसम सुहाना हो रहा, उर अगिन बुझती नहीं ऐ वात कुछ अच्छी नहीं। मार कर मुझको चली है संग दिल ले जी रहा, चाल तो चोखी चली पर घात कुछ अच्छी नहीं। प्यार कर मझधार में जो जा रहे हैं छोड़कर, क्या लिखूँ लिखते न बनता जात कुछ अच्छी नहीं। घर बहुत सूना पड़ा है आपके बिन महजवीं, दिल बहुत गंभीर है कुशलात कुछ अच्छी नहीं। आपसे विनती यही है बात मेरी मान लो, लौटकर आओ कुसुम शह मात कुछ अच्छी नहीं। मौलिक, स्वरचित सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #ग़ज़ल #शायरी

सुरेश कविराय के प्रसिद्ध दोहे "अमर शहीद"

अमर शहीद वहीद है, सारा वतन मुरीद। फ़िदा हुआ जो देश पर, ऊँचा मान शहीद।। मृत्यु एक शृंगार है, बोले अमर शहीद। प्राण निछावर कर गया, अब्दुल वीर हमीद।। मातृ भूमि की गोद में, सोए वीर अनेक। नाम अमर इतिहास में, पावन लेख सुलेख।। खुशबू अमर शहीद की, लेगा कौन ख़रीद। महक महा अनमोल है, सुंदर सरस सईद।। युग-युग तक जीवित रहे, कीर्तिमान की कीर्ति। मगर शहीदी शौर्य है, एक ईश से प्रीति।। मातृभूमि के वासते, शीश किये बलिदान। अमर शहीदी पा गये, बांके वीर जवान।। देख फिदाई वीर की, झुकते शीश प्रजेश। अमर शहीदों को नमन, करता वतन सुरेश।। मौलिक, स्वरचित सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #हिंदी #साहित्य #दोहा

वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्, सुरेश कविराय द्वारा रचित गीत

शान हमारी प्रीय तिरंगा, भारत के सम्मान की, बना हुआ पहचान तिरंगा,भारत के अभिमान की। शीश झुकाकर करें वंदना, इस पावन वरदान की, लिखी इबारत सुंदर इसने,भारत देश महान की। वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम् ।। केसरिया रँग याद दिलाता, वीरों के बलिदान की, याद दिलाता आज तिरंगा, अब्दुल वीर जवान की। त्याग शौर्य की ऐ गाथा है, गाथा सूर्य समान की, खुशीखुशी फ़ांसी को चूमा, गाथा वीर महान की। वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम् ।। श्वेत रंग संदेश सुनाता, शांति और उजियारे का, मिटा अंधेरा भारत माँ का,अंत हुआ अँधियारे का। सत्य अहिंसा और प्रेम ही,जीवन पथ निरमान का, चक्र अशोक प्रतीक बना है,नीति और विज्ञान का। वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम् ।। हरा रंग खुशहाली का है,भोजन है हर थाली का, प्रतीक बना है मातृभूमि का,धरती गौरवशाली का। अमन चैन का रंग हरा है, रंग हरा अधिमान का, अमन-चैन की गंगा बहती, गौरव हिंदुस्तान का।। वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम् ।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #हिंदी #गीत

सुरेश कविराय की ग़ज़ल, मन का उड़न खटोला छोड़ा, बिन पर उड़ना सीख लिया है।

मैंने भी जो राह चुनी है, उसपर डटना सीख लिया है। शूलों से पथ सजा हुआ है, उनपर चलना सीख लिया है। निज कर मैंने कलम उठाई, हट कर लिखना सीख लिया है, काली घोर चाँद बिन रैना, तेज चमकना सीख लिया है। गिरकर उठना फिर चल देना, और सम्भलना सीख लिया है। ज़ख़्म बहुत गहरे उर मेरे, दरद मसलना सीख लिया है। फूल नहीं हूँ जो मुरझाऊँ, आप महकना सीख लिया है। प्रेम गली है बहुत सांकरी, रिक्त निकलना सीख लिया है। निराधार को कौन सहारा, शून्य लटकना सीख लिया है। जगत वात के संग बहू मैं, केश झटकना सीख लिया है। चलो सुरेशा राह नेक पर, परहित मिटना सीख लिया है। मन का उड़न खटोला छोड़ा, बिन पर उड़ना सीख लिया है। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #ग़ज़ल #शायरी

मुबारक आपको खुशियाँ सुरेश कविराय का बधाई संगीत

ख़ुशी की बात है न्यारी, छवी लगती बहुत प्यारी। मुबारक आपको खुशियाँ, फ़िज़ाएं भी बहुत सारी। दिशाएं झूमकर गायें, बगल में चाँद तारे हैं। महकते बाग उपवन हैं, सुघड सुंदर नजारे हैं। गगन से फूल बरसत हैं, हवाएं गीत गाती हैं। मगन संगीत से महफ़िल, फ़िज़ाएं गुनगुनाती हैं। शलामत ये जुगल जोड़ी, दुआ रब से यही मेरी। रतन सब आपको अर्पण, खुशी संसार की सारी। मुबारक आपको खुशियाँ, फ़िज़ाएं भी बहुत सारी। मधू मधुवन बने तेरी, जगत में राज राजू का। समझ रखते बहुत उम्दा, न जाने हाथ बाजू का। बरस पच्चीस पूरे हैं, अभी अरमां अधूरे हैं। कली दो दो खिली आंगन, वही दो हाथ मेरे हैं। बलायें दूर रब रक्खे, सुखद आलम मिले इनको। दुआ कर जोरि के मेरी, कि रखना लाज बनबारी। मुबारक आपको खुशियाँ, फ़िज़ाएं भी बहुत सारी। ख़ुशी की बात है न्यारी, छवी लगती बहुत प्यारी। मुबारक आपको खुशियाँ, फ़िज़ाएं भी बहुत सारी। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #गीत #हिंदी