मैंने भी जो राह चुनी है,
उसपर डटना सीख लिया है।
शूलों से पथ सजा हुआ है,
उनपर चलना सीख लिया है।
निज कर मैंने कलम उठाई,
हट कर लिखना सीख लिया है,
काली घोर चाँद बिन रैना,
तेज चमकना सीख लिया है।
गिरकर उठना फिर चल देना,
और सम्भलना सीख लिया है।
ज़ख़्म बहुत गहरे उर मेरे,
दरद मसलना सीख लिया है।
फूल नहीं हूँ जो मुरझाऊँ,
आप महकना सीख लिया है।
प्रेम गली है बहुत सांकरी,
रिक्त निकलना सीख लिया है।
निराधार को कौन सहारा,
शून्य लटकना सीख लिया है।
जगत वात के संग बहू मैं,
केश झटकना सीख लिया है।
चलो सुरेशा राह नेक पर,
परहित मिटना सीख लिया है।
मन का उड़न खटोला छोड़ा,
बिन पर उड़ना सीख लिया है।
उसपर डटना सीख लिया है।
शूलों से पथ सजा हुआ है,
उनपर चलना सीख लिया है।
निज कर मैंने कलम उठाई,
हट कर लिखना सीख लिया है,
काली घोर चाँद बिन रैना,
तेज चमकना सीख लिया है।
गिरकर उठना फिर चल देना,
और सम्भलना सीख लिया है।
ज़ख़्म बहुत गहरे उर मेरे,
दरद मसलना सीख लिया है।
फूल नहीं हूँ जो मुरझाऊँ,
आप महकना सीख लिया है।
प्रेम गली है बहुत सांकरी,
रिक्त निकलना सीख लिया है।
निराधार को कौन सहारा,
शून्य लटकना सीख लिया है।
जगत वात के संग बहू मैं,
केश झटकना सीख लिया है।
चलो सुरेशा राह नेक पर,
परहित मिटना सीख लिया है।
मन का उड़न खटोला छोड़ा,
बिन पर उड़ना सीख लिया है।
सुरेश कविराय
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