भारतीय सभ्यता, सामाजिक विभाजन और झूठे राष्ट्रवाद का विमर्श इतिहास, धर्म, सामाजिक असमानता और आधुनिक चेतना के अंतर्संबंधों की पड़ताल। मौलिक वैचारिक आलेख — सुरेश चंद्रा ‘सुरेश कविराय’ प्रस्तावना : विविधता से विभाजन तक का सफर भारतीय सभ्यता और समाज के इतिहास का गंभीर अध्ययन करने पर अनेक ऐसे प्रश्न सामने आते हैं, जिनका उत्तर केवल धार्मिक आस्थाओं, सांस्कृतिक गौरवगान अथवा प्राचीन परंपराओं की प्रशंसा से नहीं दिया जा सकता। भारत एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र है, जहाँ विभिन्न जलवायु, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों और जीवन-स्थितियों ने असंख्य प्रकार के जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और मानवीय समुदायों के विकास को प्रभावित किया है। यहाँ भाषाओं, बोलियों, खान-पान, वेशभूषा, रीति-रिवाजों, धार्मिक विश्वासों और सामाजिक व्यवहारों की अद्भुत विविधता रही है। यह विविधता भारतीय सभ्यता की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक विशेषता और सांस्कृतिक संपदा है। किंतु प्रश्न यह है कि विविधताओं से समृद्ध इस समाज में सामाजिक विभाजन इतने गहरे कैसे हुए? मनुष्यों के बीच जन्म, जाति, पेशे, धार्मिक मान्यताओं और कथित सामाजिक श्रेष्ठता के आध...
सुरेश 'कविराय' की मौलिक हिंदी रचनाएँ — कुण्डलियाँ, दोहे, गीत, ग़ज़ल, कविता, मुक्तक और साहित्यिक चिंतन।