यादें पीछे खींचती, सत्य नहीं है बात।
यादें बस बतला रहीं, कब कैसे जज्बात।।
कब कैसे जज्बात, काल के संग समाते।
बीते सकल प्रसंग, लौट यादों में आते।
कहि सुरेश कविराय, विफल होती फरियादें।
बेशक बीती बात, मगर आतीं हैं यादें।।
#सुरेशकविराय #हिंदी #छंद #कुण्डलियाँ
यादें बस बतला रहीं, कब कैसे जज्बात।।
कब कैसे जज्बात, काल के संग समाते।
बीते सकल प्रसंग, लौट यादों में आते।
कहि सुरेश कविराय, विफल होती फरियादें।
बेशक बीती बात, मगर आतीं हैं यादें।।
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