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सुरेश कविराय के दोहे

पवन पुष्प की गंध का, करवाती अहसास।
पुष्प खिला कहीं और है, देत निकट आभास।।

सत्य कसौटी पुष्प सी, चले वात के संग।
मंद गति है सत्य की, जाकौ रूप न रंग।।

कमियां जिसमें खूब हों, लेकिन दिल हो साफ।
रिश्तों की ये खूबियां, मिटा देत संताप।।

बेहद होना कीमती, देगा दुःख जरूर।
कैद तिज़ोरी में रहे, हर हीरा मजबूर।।

क्षमा शील शृंगार है, प्रेम जगत में सत्य।
क्रोध द्वेष नफ़रत बुरी, ओछे ये सब कृत्य।।

प्यार और सम्मान दो, तोहफे बड़े अजीब।
बेजुबान आगे झुकें, आते जीव करीब।।

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आज विषैली हो गई

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