खुशी बहुत हैं नव जीवन में
खुशी बहुत हैं नव जीवन में,
फिर भी बहुत उदासी है।
मेरा अंतस रिक्त बहुत है,
मन अपना प्रवासी है।।
पीड़ा व्यक्त नहीं होती है,
शब्द अटक घट जाता है।
बेशक महफ़िल सजी हुई है,
मन अपना हट जाता है।
राग रंग का मंच न भाता,
पीड़ा मन की दासी है।।
खुशी बहुत हैं नव जीवन में,
फिर भी बहुत उदासी है।।
एक चंचला नभ में चमके,
घटा चीर गिर जाती है।
धरती तरस रही बादल को,
दामिन तन झुलसाती है।
बादल बरसें बेशक भू पर,
दामिन रक्त पिपासी है।।
खुशी बहुत है नव जीवन में,
फिर भी बहुत उदासी है।
मेरा अंतस रिक्त बहुत है,
मन अपना प्रवासी है।।
खुशी बहुत है नव जीवन में,
फिर भी बहुत उदासी है।
#सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #हिंदीकविता
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें