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सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

हकमारी को हक कहें, क्या ऐ अच्छा काम?
आरक्षण के खेल की, चाल हुई नाकाम।
चाल हुई नाकाम, बहुत सत्ता खिशियानी।
तनिक नहीं ईमान, करे राजा मनमानी।
चला न जादू आज, हुई संसद में ख़्वारी।
जनता की आवाज, चले ना अब हकमारी।।

ज्ञानी ही अज्ञान का, पढ़ा रहे हैं पाठ।
अंधभक्त अंधे भये, हैं पण्डन के ठाठ।
हैं पण्डन के ठाठ, मौज भी खूब उड़ाते,
माया दे दो मोय, ज्ञान इतना बतलाते।
कहि सुरेश कविराय, बनो मत इतने दानी,
शिक्षा लो अपनाय, बनोगे तब ही ज्ञानी।।

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