कीचड़ से बचते सभी, फिर भी फेंकें कीच।
देखो फूल सरोज का, खिले कीच के बीच।
खिले कीच के बीच, सरोवर की है आभा।
सर में बढ़ता नीर, बढ़े वो जल से जादा।।
कहता कवी सुरेश, लोग कुछ होते लीचड़।
करें लोग बदनाम, निखालिश फेंकें कीचड़।।
#सुरेशकविराय #छंद #कुण्डलियाँ
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