अविचल साथ
(सुरेश कविराय की कलम से)
सुविधा से पथ को चुने, वो फिर कैसा मीत।
साथ चले साथी वही, बेशक जग विपरीत।।
जगत सकल छलिया भया, परिचय सी है प्रीत।
अपना अपना राग है, लुप्त हुए मनमीत।।
रुकी नहीं सरिता कहीं, चले किनारे साथ।
सुविधा भोगी प्रेम है, साहिल हुए अनाथ।।
चप्पल जैसी को सखी, हर पथ रहती साथ।
काँटे कंकड़ से छिले, छिन्न भिन्न है गात।।
दीपक बाती तेल की, मिलती नाँहि मिसाल।
अंग जलाकर दे रहे, जोत भंगिमा लाल।।
चंदन तन शीतल करे, निज तन का बलिदान।
चंदन के बलिदान से, बनती महक महान।।
धूप तपन हो अग्नि सी, या पूनम की रात।
साथ चले साया सदा, अभ्र करे बरसात।।
कश्ती मेरी आप हो, तुच्छ एक पतवार।
खेवन हारे आप हो, नैया कर भव पार।।
साँस साँस में नाम हो, मृदु स्वर हो संगीत।
कली अली सम संग हो, अधर मनोहर गीत।।
पुष्प चढ़े सिर ईश के, तबहू संग सुगंध।
गगन उड़े सँग वात के, संग पुष्प के गंध।।
सुरेश सरल है रासता, चलना कर प्रारम्भ।
बिन स्याही की कलम से, लिखना कर आरम्भ।।
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