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विरह वेदना राधा रानी उद्धव संवाद, सुरेश कविराय की विरह की सजीवतम कृति

वेदना

छंद: विधाता
1222, 1222 / 1222, 1222

विरह वेदना का बड़ा ही रोचक प्रसंग है, बहुत भावुक करता है, एकाग्रचित होकर पढ़ें, प्रेम की अश्रुधारा शायद ही रुक पाए। राधे राधे-

विरह की वेदना पीड़ा, उरे राधा उरे गोपी।
सखा उद्धव सुनो मेरी, कहूँ मैं कृष्ण अव्यापी।।
किशन को भूल जाना है, तुम्हें ये ही बताना है।
विरह छोड़ो अरे राधे, उसी ने पीर है थोपी।।

सुने उद्धव वचन कानो, नयन से नीर वर्षा है।
ये पीड़ा प्रेम की उद्धव, विरह मेरी मुमूर्षा है।।
हमें तो कृष्ण प्यारा है, नदी हूँ वो किनारा है।
विरह संदेश भेजा है, इसी में रूप दर्शा है।।

पहुप सब अर्ज सुनलो तुम, विहग तुम भी सुनो आओ।
लताओ बीच ना आओ, सखा मम ढूँढ़ कर लाओ।।
भ्रमर तुम गान मत गाओ, सखा का राग मत गाओ।
तुम्हारा अनुशरण करता, अरे इतना न तड़फ़ाओ।।

ये जमुना तू बता मुझको, किधर बैठा मेरा कान्हा।
अरे छल कर रहा केशव, तेरे सर का सरक जाना।।
कि छल करती है वारी से, मिला मेरे मुरारी से।
डुबो आँसू तुझे देंगे, अभी तू बंद कर गाना।।

सखा उद्धव बड़े ज्ञानी, प्रतिज्ञा ज्ञान की ठानी।
करें बहु ज्ञान की बातें, मगर राधा नहीं मानी।।
सहो क्यों प्रेम की पीड़ा, उठाओ ज्ञान का बीड़ा।
परम आनंद पीड़ा में, कहे ये साफ पटरानी।।

सखा तुम घोर अज्ञानी, न जानो प्रेम की वानी।
अगर वो प्रेम का राजा, तो मैं भी प्रेम की रानी।।
हमारा प्रेम सच्चा है, तुम्हारा ज्ञान कच्चा है।।
कन्हैया संग राधा के, नयन उद्धव बहे पानी।।

दिखे राधा लगे कृष्णा, दिखे कृष्णा मगर राधा।
भ्रमित अब हो गए ऊधो, किधर कृष्णा किधर राधा।।
बिना राधा किशन आधा, विरह राधा करे वादा।
हुआ सब खून का पानी, किशन बंशी अधर राधा।।

सिखाने ज्ञान जो आये, बड़े जो ब्रह्म ज्ञानी थे।
सखा थे कृष्ण के ऊधो, परम आनंद दानी थे।।
बहुत आनंद पीड़ा में, परम् सुख प्रेम की क्रीड़ा।
भुलाया ज्ञान राधे ने, बड़े उद्धव गुमानी थे।।

सखी कृष्णप्रिया राधे, हरे राधे हरे कृष्णा,
करे भव पार श्रीकृष्णा, मिटे हर जन्म की तृष्णा।
मिले सुख चैन जीवन में, ये खुशुबू राधिके तन में,
मही पर राधिके कृष्णा, महा है प्रेम की अर्णा।।

चरन रज वंदना करते, हरे राधे हरे राधे।
विहग चाहे बना देना, चरन रज सांवरे राधे।
मुझे तरुवर बना देना, चरन रज वास दे देना।
सुरेशा दास चरणों का, भजै राधे लिखे राधे।।

#सुरेशचंद्रा #सुरेशकविराय #छन्दविधाता

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