जन जन के अंदर बसे, बड़े-बड़े अरमान,
पूरण कब किसके हुये, मिलता नहीं विधान।
मिलता नहीं विधान, अजब हैं विधि के लेखे,
समय बचे ना नैक, अंत में करै परेखे।
कहि सुरेश कविराय, न चीते होते मन के,
राम करै सो होय, अधूरे अरमाँ जन के।।
#सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #कुण्डलियाँ #छंद
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