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सुरेश कविराय की कविता "शून्य से आगे"

शून्य से आगे

निहित निराशा भी आशा में,
धूम उठा है हिम खंडों से।
नहीं मधुरता है भाषा में,
आहत है मन पाखंडों से।।

जीवन पर भारी आडंबर,
सत्य मृत्यु है डगर अकेली।
नीचे धरती ऊपर अंबर,
अध सुलझी है एक पहेली।।

राज नीति में मठाधीश हैं,
साधन बनती आज साधना।
संत करें व्यापार भगत से,
वैरागी मन भरी कामना।।

सर्प विषैला जीव जगत का,
मात सर्प को मानव देता।
नफरत का है दंश भयंकर,
रक्त बहा दामन रँग लेता।।

सागर कब कहता गहरा हूँ,
आकाश शून्य कहलाता है।
नहीं कामना शव की कोई,
हर जुल्म सहन कर जाता है।।

चंदन जैसा शीतल मन हो,
धरती जैसी सहनशीलता।
सूरज जैसा तेज सहज हो,
चन्द्र सुरेशा उर मानवता।।

सुरेश कविराय

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