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खुशुबू बदन की खुद रवा होकर चले, सुरेश कविराय की ग़ज़ल

खुशुबू बदन की खुद रवा होकर चले,
अब ये हवा भी आपदा होकर चले।

मैं मयकशी के संग में जीता रहा,
अब वक्त भी ख़ुद मयकदा होकर चले।

इक शोख़ साकी की मुझे दरकार थी,
ख़ुद ग़मज़दा थे इब्तिदा होकर चले।

किरकिर करे नैनों मिरे बिंदी तिरी,
गिरते हुए हम बाफ़िदा होकर चले।

अखनूर तुम बा-नूर हो रहमे करम,
तुम ज़िंदगी मेरी फ़िदा होकर चले।

सिंदूर तेरी माँग का बन कर सदा,
हम संग में बाक़ायदा होकर चले।

नैनन मिरे जो पीर है बहती बहुत,
अब अश्क भी मेरे ज़ुदा होकर चले।

इक प्रीति थी तेरी कशक देती रही,
क्यों रात दिन से अलहदा होकर चले?

तुझको तजुर्बा भी रुलाने का बहुत,
हमको रुला कर के विदा होकर चले।

हम आँशुओं को प्यास में पीते रहे,
आशिक़ मगर तेरे सदा होकर चले।

अब भी सुरेशा वायदे पर है अडिग,
हम आज भी इक वायदा होकर चले।

#सुरेश_कविराय
#Sureshkaviray #gazal #shayeri

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