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सुरेश कविराय के दोहे

तृप्त कौन संसार में, नहि बुझती है प्यास।
जोगी भोगी एक से, स्वाति बूंद की आस।।

पिया मिलन की आस मन, मन में उठत उमंग।
बेसक तन से दूर मैं, मन प्रीतम के संग।।

मोह जगत इक फ़ांस है, मोह चले विपरीत।
मिलने का मन मोह है, मोह जगत की रीत।।

त्यागूं कैसे मोह को, मोह रूह का नूर।
पास हमारे मोह है, प्रीतम मुझसे दूर।।

नहीं पता मुझको दिया, दिल मेरा मजबूर।
मन ही मेरा आसरा, लेगा ढूंढ जरूर।।

विरहा के मन की दशा, बिगड़े बिन पैगाम।
रोम रोम में ढूंढती, एक यही बस काम।।

माया के बस साजना, मोय किया बदनाम।
रात कटे ना दिन मिरा, रोऊँ आठों याम।।

तड़प रही है आतमा, नैनन बहता नीर।
साजन तेरी याद में, उठे कलेजे पीर।।

मिलने की मन कामना, मत कर तनिक अबेर।
हीये की आवाज सुन, सुन साजन ले टेर।।

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