मंज़िल दर मंज़िल
मंज़िल दर मंज़िल चला, लगी न मंज़िल हाथ।
एक नाम संसार में, नाम चलेगा साथ।।
नाम चलेगा साथ, साथ मंज़िल तक जाये।
दूजा नहीं उपाय, नहीं मंज़िल मिल पाये।।
कहि सुरेश कविराय, नहीं होगा कुछ हासिल।
जपले हरि का नाम, मिलेगी निश्चित मंज़िल।।
मंज़िल में वाधा बनें, लोभ मोह सुख चंद।
नाम उतारे पार भव, अमित भाव स्वच्छंद।।
अमित भाव स्वच्छंद, अकेला एक सहारा।
राम नाम की नाव, मिलेगा आप किनारा।।
कहि सुरेश कविराय, नदी के साथी साहिल।
साहिल दोनों साथ, मिली सरिता को मंज़िल।।
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