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सुरेश कविराय की "निर्मला" २०दोहे

सुरेश की निर्मला

१.
रसना में रसधार हो, मन में करुण पुकार।
संयम सँग सदभावना, कभी न होगी हार।।

२.
पाना तो सौभाग्य है, खोना ही दुर्भाग्य।
चेतन से जब चित जुड़े, वो पल है वैराग्य।।

३.
मिलने की मन कामना, है मेरे जगदीश।
मिला आपसे दीजिये, मुझको दो आशीष।।

४.
बिना प्रेम के जीव को, मिले नहीं संतोष।
प्रेम सुधा संजीवनी, व्रत पूरण प्रदोष।।

५.
कर्म कथा करनी कही, चलो समय के संग।
तोर निभे सँग प्रेम की, चढ़े प्रेम का रंग।।

६.
गति बेगति बिन प्रेम के, जप तप सब बेकार।
प्रेम एक है रास्ता, ईश मिलें कर प्यार।।

७.
देख मुहब्बत आज कल, खूब हुई बदनाम।
वफ़ा नफा को अब करें, मचा जगत कुहराम।।

८.
निश्छल प्रेम प्रभाव का, असर बहुत गंभीर।
राधा मोहन प्रेम का, अक्षय एक तुणीर।।

९.
प्रेमातुर इक पीर है, कशक सकल प्राचीर।
प्रेम विरह पर जा रुके, लगे कलेजे तीर।।

१०.
भाँति भाँति के रोग हैं, रोगी सब संसार।
प्रेमरोग सबसे बड़ा, नहीं कहीं उपचार।।

११.
नैनन में सूरत बसी, क्या काशी हरिद्वार।
आस मिलन की आपसे, लीला अपरम्पार।।

१२.
ईश लगन वरदान है, देती दिव्य प्रकाश।
दिव्यज्योति है आक की, त्याग दिये अवकाश।।

१३.
चिंता चेतन ही हरे, चित को दे आनंद।
प्रभु चरणन के हेत से, मिलता परमानंद।।

१४.
पूर्ण समर्पित चेतना, से ही हो कल्याण।
चिंतन से चेतन जगे, चिंतन ज्ञान समान।।

१५.
मोक्ष जगत से मुक्ति है, जाने सकल जहान।
बिन साधन के साधना, मोक्ष नहीं महमान।।

१६.
ध्यान योग मन कामना, जप तप का क्या काम।
हेत एक प्रभु राम से, शबरी के घर राम।।

१७.
मन वैरागी हो गया, लखि सूरत अभिराम।
शेष नहीं मन कामना, रमे सांस में राम।।

१८.
जीत हुई है हार कर, जीवन है साकार।
हेत सुरेश महेश से, अर्पण करो विकार।।

१९.
पुष्पांजलि इक अंजली, अर्पण करे सुरेश।
शरण आपनी राखिये, मत रखना परदेश।।

२०.
निर्मल मन की निर्मला, बहती पावन धार।
गंगा जी की धार में, मन को किया सुमार।।

सुरेश कविराय 

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सुरेश कविराय

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