'पाषाण और परमात्मा' शीर्षक दोहा-शृंखला यहाँ प्रस्तुत है, जो शिल्पकार और पाषाण के माध्यम से ईश्वर व इंसान के अंतर्संबंधों को दर्शाती है। यह काव्य रचना पत्थर की मूरति में भगवान के वास, शिल्पकार के महत्व और मानव के मन में व्याप्त नफ़रत पर आधारित है।
।। पाषाण और परमात्मा ।।
पत्थर को भगवान का, देता रूप बनाय।
ऐसी अद्भुत साधना, जग में दूजी नाय।।
शिल्पकार के शिल्प को, मिला नहीं सम्मान।
पाखण्डी पाखण्ड कर, बन बैठे भगवान।।
को पत्थर भगवान है, किस कण कण में प्राण।
केवल करुणा भाव में, मिलते हैं भगवान।।
नफ़रत वश पागल हुए, पत्थर मारे शीष।
ईश नहीं पाषाण में, अर्थहीन आशीष।।
पत्थर तो भगवान है, पत्थर दिल इंसान।
मंदिर ही पाखण्ड का, बना दिया स्थान।।
मन मंदिर है ईश का, कहते पीर सुजान।
पत्थर में भगवान हैं, नहि माने विज्ञान।।
नफ़रत मन से त्याग दो, कहता कवी सुरेश।
सूरज चंदा भूमि ही, बृह्मा विष्णु महेश।।
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