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सुरेश कविराय के दोहे "नैन"

नैनन की अनुकूलता, नैनन के अनुकूल।
नैनन को भाये नहीं, जो दीखे प्रतिकूल।।

नैना मेरे बाबरे, बहते हैं दिन रात।
वजह एक अपनत्व है, जो नहि छोड़ा जात।।

दुश्मन अपने ही भये, छोड़ चले कहि दूर।
आँसू मेरी आँख के, हुए बहुत मजबूर।।

कुछ तो ऐसी बात है, हूँ जिससे लाचार।
आँसू मेरी आँख के, गिर करते प्रतिकार।।

पढ़कर ये संदेश मैं, लिखने को मजबूर।
नैनन को समझाइये, आकर आप हुज़ूर।।

दिल तेरा पत्थर हुआ, मैं नाजुक हूँ काँच।
टूट जाय कटु बोल से, नहीं साँच को आँच।।

मन ऐसे ही भाव हैं, मिलें न और उधार।
जैसा था वैसा लिखा, अच्छा या बेकार।।

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