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सुरेश कविराय के दोहे बदलते दौर और समसामयिक चुनौतियाँ

बदलते दौर और समसामयिक चुनौतियाँ

1. तकनीकी बदलाव और संक्रमण काल

परिवर्तन के दौर में, छूटी कलम दवात।
तकनीकी विकसित हुई, चलना होगा साथ।।

2. लेखकों का ऐतिहासिक गौरव और अस्त्र

लेखे लेखक ने लिखे, वही बना इतिहास।
कागज कलम दवात ही, अस्त्र आपके खास।।

3. शोधपरक लेखन और सामाजिक प्रामाणिकता

शोध करे पाछे लिखै, लेखन नहि आसान।
दर्पण है संसार का, लेखन काम महान।।

4. बदलते गणतंत्र में शिक्षा की अनिवार्यता

बदल रहा सब तंत्र है, बदल रहा गण तंत्र।
शिक्षा ही वरदान है, नहीं काम के मंत्र।।

5. व्यावहारिक संकट और लाचार व्यवस्था

महँगाई की आजकल, बहुत बड़ी रफ़्तार।
राजतंत्र पन्गू हुआ, सत्ता है बीमार।।

6. शिक्षा का बाज़ारीकरण और युवा संघर्ष

अतिवादी सरकार ने, शिक्षा की बर्बाद।
छात्र सड़क पर आगये, पूँजीपति आवाद।।

7. एक लेखक का धर्म

सत्ता का भी आज कल, लेखन पर परहार।
लेखन अपना धर्म है, मानो मत ना हार।।

8. कवि की भणित और लोक-सत्य की घोषणा

नौटंकी सरकार की, चारों और कलेश।
सत्ता बेईमान है, सच्ची लिखी सुरेश।।

#सुरेशकविराय #सुरेश #दोहाछंद

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न कोई याद आता है सुरेश कविराय के मुक्तक

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आज विषैली हो गई

 "राजनीतिक संवादों में जब मर्यादा और तर्क की जगह अंधभक्ति और हिंसा ले ले, तो समाज का ताना-बाना बिखरने लगता है। जहाँ रक्षक ही भक्षक बनकर आस्था और विश्वास को लूटने लगें, वहाँ न्याय की बुनियादी हवा भी ज़हरीली महसूस होने लगती है। आइए, इसी कड़वे सच से साक्षात्कार कराती यह रचना सुनें..." आज विषैली हो गयी, राजनीति की बात,  अंधभक्त हाबी हुये, चलते घूँसा लात।  चलते घूँसा लात, झूँठ को साँच बताते,  कहते चौकीदार, लूट मंदिर को खाते।  कहि सुरेश कविराय, अनीती इनकी शैली,  न्यायालय में गंध, फैलती आज विषैली।। #कुंडलियाँ #हिंदीसाहित्य #सुरेशकविराय

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