मात मुहब्बत में मिलती है,
तैयार कज़ा मिल सकती है।
नहीं भरोसा यार वफ़ा का,
हर शख्त सजा मिल सकती है।
अद आईना बनना होगा,
मजनू बन चलता काम नहीं।
जैसा रूप अनूप प्रिये का,
अंदाज नहीं पैग़ाम नहीं।
बनना होगा दर्पण मन का,
आजाद रज़ा मिल सकती है।
नहीं भरोसा यार वफ़ा का,
हर शख्त सजा मिल सकती है।
प्रेम दिवानी कहा नदी को,
सरिता परिदूषित सारी है।
हुई मुहब्बत अब बरसा सी,
सरिता की गति पे नारी है।
स्वारथ भारी नर नारी पर,
तो कहाँ वफ़ा मिल सकती है।
नहीं भरोसा यार वफ़ा का,
हर शख्त सजा मिल सकती है।
रैन - दिवस सी नहीं मुहब्बत,
उदय दिवस का अंत रात का।
नहीं मिलन मुमकिन दोनों का
सानी कोई नहीं साथ का।
एक याचना शब की दिन से,
क्या एक दफ़ा मिल सकती है?
नहीं भरोसा यार वफ़ा का,
हर शख्त सजा मिल सकती है।
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