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नभ अब्र घटा छा जाती है सुरेश कविराय की कविता

जब विरह अनल में जलता मन,
संयोग हवा बन जाती है।
तपती वसुधा की धड़कन पर,
नभ अब्र घटा छा जाती है।

है प्रेम पिपासा नैनन में,
भीतर से सिंधु उमड़ता है।
सावन बरसे कुछ पल लेकिन,
आँखों से सदा बरसता है।
नैना मूक नहीं रह पाते,
पर बात नहीं हो पाती है।
तपती वसुधा की धड़कन पर,
नभ अब्र घटा छा जाती है।

छिपी हुई पावक उर पाहन,
मृदु शीतल पवन सुहाती है।
आशाएँ जीवित रहतीं हैं,
पर अभिलाषा मर जाती है।
भूल गयीं हैं राह सदाएं,
फिर याद उसी की आती है।
तपती वसुधा की धड़कन पर,
नभ अब्र घटा छा जाती है।

दीपक जलकर करे रोशनी,
चल परवाने आ जाते हैं।
करने वाले करें मुहब्बत,
कुछ जलभुन कर मर जाते हैं।
तेल जले दीपक कब जलता,
संग जलती केवल बाती है।
तपती वसुधा की धड़कन पर,
नभ अब्र घटा छा जाती है।

#सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #हिन्दीकविता

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