1222, 122
तो मुझमें शूल है क्या?
ये कोई भूल है क्या?
बहुत कांटे लता पर,
लता पर फूल है क्या?
शकल शीशा न दीखी,
सफा कर धूल है क्या?
न पत्ते हैं न फल हैं,
तो कोई मूल है क्या?
न पायल है न बिछुआ,
कोई कनफूल है क्या?
कोई छाया नहीं है,
ये पेड़ बबूल है क्या?
मनाया इसलिए ना,
समय अनुकूल है क्या?
सुरेशा के निकट अब,
सभी कुछ स्थूल है क्या?
#सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #ग़ज़ल
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