अगर मैं प्यार का सागर", नदी तू भी दिवानी है।
घटा को घाट तक लाकर, लुटा जाती जवानी है।।
अजब हैं प्यार के किस्से, बना कविता सुनाता हूँ।
मधुर था नीर सरिता का, मिलत खारी रवानी है।।
जहाँ से सार में आयी, किनारे संग साये थे।
चली जब छोड़के साहिल, पड़ी निजता गवानी है।।
नदी पीती नहीं पानी, तरुवर फल नहीं खाते।
भला इनसे बड़ा कोई, मुझे दीखे न दानी है।।
मिलेंगें सिंधु में मोती, उदर में सीप के पलते।
जलधि का जल नही पीती, गरभ स्वांती समानी है।।
धरा देती सहारा है, शशी शीतल करे मन को।
दिवाकर जान देता है, किरन भी खानदानी है।।
सुधा के ध्यान बैठा हूँ, सुरा का पान करता हूँ।
जिगर जो पीर बैठी है, सुरेशा के दवानी है।।
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