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प्रकृति गान सुरेश कविराय

शैल-शिखर-नभ-पवन-प्रदाइन
पालक भूमि विधाता
हिमगिरि विंध्य अरावलि पर्वत
सिन्धु नर्मदा गंग:
जल नीलांबर मरुथल सुंदर
उज्ज्वल नव निधि रंग:
सत शुचि जगत निहारे, सब ऋतु चक्र पुकारे
धानी चोला गाता।
सकल सृष्टि जग मंगलदायक
पालक भूमि विधाता।
शुचि दे शुचि दे शुचि दे
शुचि शुभ सुख गति दे।।

कानन-कुंज-घने अति सुंदर
भू को स्वर्ग बनाता
मधुकर गुंजन खग-कुल कलरव
गान मनोहर गूंजे
सर सरिताएँ स्रोत नीर की
सलिल कमल दल फूले
मोहित सुर नर सारे, शोभा जगत निहारे
प्रकृति जगत की माता
सकल सृष्टि जग मंगलदायक
पालक भूमि विधाता
शुचि दे शुचि दे शुचि दे
शुचि शुभ सुख गति दे।।

#सुरेशकविराय #सुरेशचंद्रा #प्रकृतिगान 

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 "राजनीतिक संवादों में जब मर्यादा और तर्क की जगह अंधभक्ति और हिंसा ले ले, तो समाज का ताना-बाना बिखरने लगता है। जहाँ रक्षक ही भक्षक बनकर आस्था और विश्वास को लूटने लगें, वहाँ न्याय की बुनियादी हवा भी ज़हरीली महसूस होने लगती है। आइए, इसी कड़वे सच से साक्षात्कार कराती यह रचना सुनें..." आज विषैली हो गयी, राजनीति की बात,  अंधभक्त हाबी हुये, चलते घूँसा लात।  चलते घूँसा लात, झूँठ को साँच बताते,  कहते चौकीदार, लूट मंदिर को खाते।  कहि सुरेश कविराय, अनीती इनकी शैली,  न्यायालय में गंध, फैलती आज विषैली।। #कुंडलियाँ #हिंदीसाहित्य #सुरेशकविराय

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