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सुरेश कविराय की कुण्डलियाँ

रखना होगा फ़ासला, जीव जगत के बीच।
देख अमर है आतमा, देह जगत नवनीच।।
देह जगत नवनीच, मरम वैरागी जाने।
एक जगत वैराग्य, न बिल्कुल मन की माने।
कहता खरी सुरेश, रूह के माफिक चलना।
निकट रहे वैराग्य, दूर इस मन को रखना।।

इच्छाएं पुरजोर हैं, द्रण निश्चय कमजोर।
होगी पूरी कामना, और लगाले जोर।।
और लगाले जोर, अंत में जीत मिलेगी।
द्रण निश्चय वरदान, कली बन फूल खिलेगी।।
देख सुरेश महान, चाँद की चंद्र कलायें।
द्रण निश्चय ले ठान, पूर्ण हों सब इच्छाएं।।

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