।। ज्ञान-रत्न दोहावली ।।
ज्ञान स्रोत है शक्ति का, प्राण समान चरित्र।
ज्ञान ज्योति ब्रह्मांड में, महक रही बन इत्र।।
पन्ना माणिक रत्न हैं, सोना चाँदी तत्व।
अवयव आते जात हैं, ज्ञान बने अस्तित्व।।
नीलम हीरा के लिए, दान दिया पुखराज।
मोती मन का चंद्रमा, जान रतन के काज।।
ग्रह योग ब्रह्मांड का, करते हैं निर्माण।
रतन रखें समरूपता, करने को कल्याण।।
ज्ञानी ने पहचान कर, रतन लिए नव खोज।
रतन ग्रहों का तत्व हैं, ज्ञानी फूल सरोज।।
रतन बहुत नकली मिलें, रखना ध्यान हमेश।
पंडा पाजी हो गए, काज़ी बुरे विशेष।।
ज्ञानी के भी ज्ञान से, करना तर्क सुरेश।
रत्नों का बाज़ार अब, लालच का परिवेश।।
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