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सुरेश कविराय की ग़ज़ल, चाहकर भी भूलना ये बात कुछ अच्छी नहीं,


चाहकर भी भूलना ये बात कुछ अच्छी नहीं,
चाँद पूरा नभ खिले पर रात कुछ अच्छी नहीं।

अभ्र में काली घटायें हो रहीं बेताब सी,
मास सावन का झरे वर्षात कुछ अच्छी नहीं।

माँगना अच्छा नहीं पर साथ की दरकार है,
प्यार की बस लालसा खैरात कुछ अच्छी नहीं।

गम बहुत मुझको दिया है दिल बहुत बेजार है,
याद हीं अब शेष हैं सौगात कुछ अच्छी नहीं।

शुष्क है वीरान दिल मौसम सुहाना हो रहा,
उर अगिन बुझती नहीं ऐ वात कुछ अच्छी नहीं।

मार कर मुझको चली है संग दिल ले जी रहा,
चाल तो चोखी चली पर घात कुछ अच्छी नहीं।

प्यार कर मझधार में जो जा रहे हैं छोड़कर,
क्या लिखूँ लिखते न बनता जात कुछ अच्छी नहीं।

घर बहुत सूना पड़ा है आपके बिन महजवीं,
दिल बहुत गंभीर है कुशलात कुछ अच्छी नहीं।

आपसे विनती यही है बात मेरी मान लो,
लौटकर आओ कुसुम शह मात कुछ अच्छी नहीं।

मौलिक, स्वरचित
सुरेश कविराय


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