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✍️ काव्य-सप्तक: लेखक का धर्म और साधना सुरेश कविराय

✍️ काव्य-सप्तक: लेखक का धर्म और साधना

1. मार्गदर्शक और संकट-नाशक भूमिका

दिशा दिखाती जग चले, लेखक की हर चाल।
चिंतन से चिंता कटे, कटे कष्ट हर हाल।।

2. सत्यनिष्ठा और वैचारिक सजगता

सत्य हमेशा जो लिखे, भाव रहे निष्पक्ष।
कलम सिपाही देश की, एक चेतना लक्ष।।

3. निरपेक्ष साधना और वैचारिक स्वतंत्रता

लेखक तो लिखता रहे, तजकर पक्ष-विपक्ष।
लेखन है इक साधना, लिखना है निष्पक्ष।।

4. मौलिकता और व्यावसायिकता का विरोध

भीड़-भाड़ के शोर में, अपनी मौलिक सोच।
मोल नहीं बाज़ार में, वह लेखक सर्वोच्च।।

5. ज्ञान का सरलीकरण और बौद्धिक शुद्धता

गूढ़ बात विज्ञान की, सहज सरल आधार।
लेखक ऐसे चाहिए, जिनके शुद्ध विचार।।

6. तार्किक विस्तार और गंभीर समीक्षा

तर्क शक्ति विस्तार से, लिखना होगा और।
लेखक के हर लेख पर, करना होगा गौर।।

7. इतिहास के संरक्षक और कालजयी स्वर

युगों युगों तक गूंजती, भूत देत आवाज।
लेखक तेरे लेख ही, भूतकाल के राज।।

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