हजारों ख्वाइशें मेरी मगर अब एक वाकी है।
मचलते आज पैमाने मगर हमराज साकी है।
बहुत बेफिक्र मयखाने, बिखरते आज पैमाने।
मगर घट मै अटकती है कि जीवन एक झाँकी है।।
#सुरेशकविराय ₹हिंदी #छंद #मुक्तक ₹बहरेहजज
सुरेश 'कविराय' की मौलिक हिंदी रचनाएँ — कुण्डलियाँ, दोहे, गीत, ग़ज़ल, कविता, मुक्तक और साहित्यिक चिंतन।
हजारों ख्वाइशें मेरी मगर अब एक वाकी है।
मचलते आज पैमाने मगर हमराज साकी है।
बहुत बेफिक्र मयखाने, बिखरते आज पैमाने।
मगर घट मै अटकती है कि जीवन एक झाँकी है।।
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