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सुरेश कविराय के सुंदर दोहे "भूमि"

भूमी से भगवान का, है प्यारा संबंध।
ईश्वर अंस जमीन का, अंग संग अनुबंध।।१।।

कृष्ण राम अवतार का, बनी भूमि ही केंद्र।
अंस भूमि उपयोग से, हार गए खुद इंद्र।।२।।

पांच तत्व निर्माण के, भूमी उनमें एक।
ईश्वर के अवतार के, लेखे लेख अनेक।।३।।

बिना भूमि के भूमि पर, संभव नहि अवतार।
सीता मैया भूमि का, रूप बनी साकार।।४।।

वक्ष वृहद है भूमि का, करे नहीं प्रतिरोध।
भूमि गर्भ में संपदा, होत निरंतर शोध।।५।।

जोरू और जमीन के, झगड़े बढ़े तमाम।
साथ भूमि किसके गयी, छोड़ चले बलराम।।६।।

धरती ने हर आपदा, का कीया सम्मान।
मान और अपमान सब, भू को लगे समान।।७।।

मैला आँचल हो रहा, देखो नज़र पसार।
भूमि एक वरदान है, जीव जगत का सार।।८।।

धरती माँ के प्रेम ने, प्रहरी दिया बनाय।
मैं भू की रक्षा करूँ, अपना रक्त बहाय।।९।।

धरती माता आपसे, विनती है करजोर।
शील क्षमा माँ दीजिये, मत करना कमजोर।।१०।।

भूमी गौरव गान का, खुद ही दस्तावेज।
भोजन भूमी दे रही, जैसे सूरज तेज।।११।।

सुरेश कविराय

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