सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सुरेश कविराय के दोहे ।। वैराग्य ।।

।। वैराग्य ।।

दर्शन इक वैराग्य है, मनोभाव का त्याग।
जगत विसारे भी नहीं, नहीं स्वर्ग का राग।।

अंतर में वैराग्य की, नियमित चलती खोज।
वात जगत की में बहे, जल में फूल सरोज।।

कौन कला वैराग्य में, दिव्य तत्व का ज्ञान।
उदासीन सम्मान से, सुखद लगे अपमान।।

राज्य एक वैराग्य है, बिन राजा का राज।
कंचन माटी एक सी, वैरागी का ताज।।

अंतर्मन खाली करो, बचे नहीं अवशेष।
अब कोई चिंता नहीं, नहीं कामना शेष।।

वास नगर वनवास में, या हो शून्य निवास।
शांति महा अनुराग में, मन मोहन का दास।।

प्रेम एक वैराग्य का, है अच्छा पर्याय।
त्याज्य वासना आपनी, उत्तम एक उपाय।।

नेक सुरेश विराग से, शांति मिले भरपूर।
रिक्त रहे अतिरिक्त से, अनुपम महक कपूर।।

#सुरेशचंद्रा   #सुरेशकवीरा   #हिंदीछंद   #दोहा

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

न कोई याद आता है सुरेश कविराय के मुक्तक

  नहीं दिल में रहा कोई, न कोई याद आता है। मगर इक दर्द है दिल में, वही हर पल सताता है। दिमागी हाल अच्छा है, मगर वो ख़्वाब सच्चा है। बसा जो रूह के अंदर, पता अंतस बताता है।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #हिंदी #मुक्तक

आज विषैली हो गई

 "राजनीतिक संवादों में जब मर्यादा और तर्क की जगह अंधभक्ति और हिंसा ले ले, तो समाज का ताना-बाना बिखरने लगता है। जहाँ रक्षक ही भक्षक बनकर आस्था और विश्वास को लूटने लगें, वहाँ न्याय की बुनियादी हवा भी ज़हरीली महसूस होने लगती है। आइए, इसी कड़वे सच से साक्षात्कार कराती यह रचना सुनें..." आज विषैली हो गयी, राजनीति की बात,  अंधभक्त हाबी हुये, चलते घूँसा लात।  चलते घूँसा लात, झूँठ को साँच बताते,  कहते चौकीदार, लूट मंदिर को खाते।  कहि सुरेश कविराय, अनीती इनकी शैली,  न्यायालय में गंध, फैलती आज विषैली।। #कुंडलियाँ #हिंदीसाहित्य #सुरेशकविराय

शिक्षा देती ज्ञान

  पोथी रट पंडित बने, भीतर भरा कबाड़। पाखंडों का देश में, ऊँचा खड़ा पहाड़। ऊँचा खड़ा पहाड़, तर्क से ढोंगी डरता। नफ़रत का बाज़ार, गरम पाखण्डी करता।। कहि सुरेश कविराय, छोड़ सब बातें थोथी। शिक्षा देती ज्ञान, छोड़ दे रटना पोथी।। सुरेश कविराय