।। वैराग्य ।।
दर्शन इक वैराग्य है, मनोभाव का त्याग।
जगत विसारे भी नहीं, नहीं स्वर्ग का राग।।
अंतर में वैराग्य की, नियमित चलती खोज।
वात जगत की में बहे, जल में फूल सरोज।।
कौन कला वैराग्य में, दिव्य तत्व का ज्ञान।
उदासीन सम्मान से, सुखद लगे अपमान।।
राज्य एक वैराग्य है, बिन राजा का राज।
कंचन माटी एक सी, वैरागी का ताज।।
अंतर्मन खाली करो, बचे नहीं अवशेष।
अब कोई चिंता नहीं, नहीं कामना शेष।।
वास नगर वनवास में, या हो शून्य निवास।
शांति महा अनुराग में, मन मोहन का दास।।
प्रेम एक वैराग्य का, है अच्छा पर्याय।
त्याज्य वासना आपनी, उत्तम एक उपाय।।
नेक सुरेश विराग से, शांति मिले भरपूर।
रिक्त रहे अतिरिक्त से, अनुपम महक कपूर।।
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