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सुरेश कविराय के दोहे "बचपन"

काव्य-सप्तक: बालपन और विद्यालय की स्मृतियाँ

1. जीवन की उर्वरा भूमि

बचपन के स्कूल भी, उत्तम उर्वर खेत।
जीवन की संभावना, विद्यालय की रेत।।

2. अक्षरारंभ और कौतूहल

बचपन के कौतुक बड़े, पकड़ी हाथ सलेट।
अक्षर लिखने के लिए, खड़िया से की भेट।।

3. बस्ते का बोझ और मस्ती का सामंजस्य

वस्ते के भी साथ में, मस्ती मगन मतंग।
पट्टी इक हथियार थी, रहती सबके संग।।

4. मध्यांतर (इंटरवल) और सामूहिक आनंद

आधी छुट्टी का समय, बजती घंटी रोज।
खाना कम मस्ती घनी, सब बच्चन की मौज।।

5. सावन, तालाब और कागज़ की नावें

कागज की वे कश्तियाँ, जब छोड़ी तालाब।
दूर नाव तट से हुई, खुशियों का सैलाब।।

6. बाल-मन की बेफिक्री और तरलता

सावन की बौछार हो, या हो बहता नीर।
मस्ती मन की कामना, बचपन कब गंभीर।।

7. विद्यालय का आंचल और वात्सल्य

बचपन की उस धूल में, छुपा हुआ था प्यार।
विद्यालय के वक्ष ही, बचपन के संसार।।

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