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सुरेश कविराय का पावस प्रताप (दोहा संग्रह)

पावस प्रताप (दोहा संग्रह)

ॐ मंगलाचरण

ईश चरण रज वंदना, पावस प्रीति महेश।
पावस जीवन-दायिका, लागीं लगन सुरेश।।

खंड 1: पावस आगमन और प्रकृति का श्रृंगार

रिमझिम जब बरसात हो, भू से उठे सुवास।
तरु पल्लव सब झूमते, मन सबके उल्लास।। (1)

खुशियाँ आंगन नाचतीं, भू की तृप्त पिपास।
मिट्टी से उठने लगी, सौंधी सुखद सुवास।। (2)

शीत सरस बौछार से, आया भूमि निखार।
नूर भूमि पर आ गया, लेकर मस्त बहार।। (3)

नहीं भूमि को चाहिए, कोई मुक्ताहार,
जने रतन बहु कोख से, चंदन पुष्पाहार।। (4)

शीतल सरस सुहावनी, बहने लगी बयार।
शीतल तन मन को करे, रिमझिम बन बौछार।। (5)

खंड 2: जीव-जंतु और वन-उपवन की मस्ती

कोयल प्यारी कूकती, बैठ पेड़ की डार।
मोर मस्त वन नाचते, मन में मेघ पुकार।। (6)

बारिश का मौसम सुघड़, मोर नाचते बाग।
पानी से लबरेज हैं, सरि सर और तडाग।। (7)

नभ गरजे घनघोर घन, कानन बोले मोर।
मेघन की नभ गर्जना, करे बीजुरी शोर।। (8)

मस्ती की अठखेलियाँ, मिलती नहीं उधार।
रिमझिम बारिस बन गयी, मस्ती का आधार।। (9)

खंड 3: मानवीय भावनाएँ और विरह-प्रेम

रिमझिम की बरसात से, मौसम बदले रंग।
प्रेम रंग के रंग में, उठती बहुत तरंग।। (10)

विरहा के तन पर पड़े, शीतल मंद फुहार।
अगनि फुहारों से लगे, निकले करुण पुकार।। (11)

रिमझिम सी बरसात ही, सकल सुखों की खान।
नैसर्गिक आनंद की, मंद मंद मुस्कान।। (12)

खंड 4: समय-चक्र, संस्कृति और लोक-कल्याण

मेघन के मधुमास हैं, ऋतुवर्षा के मास।
धर्म कर्म के हेत को, आते चातुर्मास।। (13)

नभ में चमके चंचला, पावस का गुणगान।
तृप्त करो तुम भूमि को, पावस जग वरदान।। (14)

रिमझिम की बरसात से, धरती मस्त सुरेश।
इंद्रदेव भगवान से, विनती करें नरेश।। (15)

सुरेश कविराय

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