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सुरेश कविराय की ग़ज़ल,लिखूँ मैं दास्ताँ अपनी

लिखूँ मैं दास्ताँ अपनी, किसी सूखी सिहाई से,
सजे थे स्वप्न आँखों में, मगर बिखरे जुदाई से।।

शिकायत भी करूँ किससे, जुदा है जिंदगी मुझसे,
खफ़ा जब ईश ही मुझसे, नयन सूखे विदाई से।।

हवा लगती नहीं शीतल, न पर्वत हौसला देते,
उभर आए जखम दिल के, नहीं भरते दवाई से।।

न कोई ख्वाब आँखों में, न छत पर चाँद आता है,
गगन में डूब जाता हूँ, बचूँ मैं जग हँसाई से।।

नज़र में एक ही मंज़िल, ग़ज़ल का थाम लूँ दामन,
सुरेशा दास्ताँ लिखता, ग़ज़ल की रहनुमाई से।।

१२२२, १२२२, १२२२, १२२२
#सुरेशचंद्रा   #सुरेशकविराय   #ग़ज़ल

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