आलाप
बहर: 2212 2212 2212 2212
रोशन कभी थी ज़िंदगी महताब का आलाप है।
ग़मख़्वार कोई ग़ैर है यह गुफ़्तगू संताप है।
झँनकार पायल की कभी संगीत थी मनमीत की।
है मौन मौसम मौशिकी खामोश ख़ुद पदचाप है।
नगमे मुहब्बत के नये लव चूमते रहते ख़ुदी।
लव पर नहीं अब लब्ज इक क्यों लब्ज़ हर चुपचाप है?
माना कि उल्फ़त खून है रग की रसिक है आशिकी।
क्यों राग अब बेराग है क्या मौशिकी भी पाप है?
आँसू बहे अब्सार से उम्मीद क्या ग़मख़्वार से।
ये बेखुदी तेरी सुरेशा एक पश्चाताप है।
#सुरेशकविराय #सुरेशा #सुरेशचंद्रा #ग़ज़ल
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें