पावस ऋतु रिमझिम
रिमझिम जब बरसात हो, भू से उठे सुवास।
तरु पल्लव सब झूमते, मन सबके उल्लास।।
खुशियाँ आंगन नाचतीं, भू की तृप्त पिपास।
मिट्टी से उठने लगी, सौंधी सुखद सुवास।।
शीत सरस बौछार से, आया आप निखार।
नूर भूमि पर आ गया, लेकर मस्त बहार।।
नहीं भूमि को चाहिए, कोई मुक्ताहार,
जने रतन बहु कोख से, चढ़ते पुष्पाहार।।
कोयल प्यारी कूकती, बैठ पेड़ की डार।
मोर मस्त वन नाचते, मन में मेघ पुकार।।
मस्ती की अठखेलियाँ, मिलती नहीं उधार।
रिमझिम बारिस बन गयी, मस्ती का आधार।।
मेघन के मधुमास हैं, ऋतुवर्षा के मास।
धर्म कर्म के हेत को, कहते चातुर्मास।।
रिमझिम सी बरसात ही, सकल सुखों की खान।
नैसर्गिक आनंद की, मंद मंद मुस्कान।।
शीतल सरस सुहावनी, बहने लगी बयार।
शीतल तन मन को करे, रिमझिम की बौछार।।
बारिश का मौसम सुघड़, मोर नाचते बाग।
पानी से लबरेज हैं, सरि सर और तडाग़।।
नभ गरजे घनघोर घन, कानन बोले मोर।
मेघन की नभ गर्जना, करे बीजुरी शोर।।
रिमझिम की बरसात से, मौसम बदले रंग।
प्रेम रंग के रंग में, उठती बहुत तरंग।।
विरहा के तन पर पड़े, शीतल मंद फुहार।
अगनि फुहारों से लगे, निकले करुण पुकार।।
रिमझिम की बरसात से, धरती मस्त सुरेश।
इंद्रदेव भगवान से, विनती करें नरेश।।
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