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सुरेश कविराय के दोहे "आत्म समर्पण"

समर्पण दोहावली

सादर नमन। मेरी नई काव्य-कृति 'समर्पण दोहावली' आप सभी सुधी पाठकों और साहित्य-प्रेमियों के समक्ष प्रस्तुत है। प्रकृति के त्याग, निस्वार्थ अर्पण और आत्मा के विसर्जन के गहरे भावों को समेटती यह दोहावली आज इस गरिमामयी डिजिटल मंच पर साझा करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है। आशा है, समर्पण के ये सरल भाव आपके अंतर्मन को स्पर्श करेंगे। प्रस्तुत काव्य कृति समर्पण को आप अपनी प्रतिक्रियाओं और स्नेह से अवश्य अनुग्रहित करें।

सादर!

आत्म समर्पण भाव से, ईश मिलन के लेख।
शक्ति समर्पण से मिले, बनते लेख सुलेख।।

रुकी नहीं सरिता कहीं, चले किनारे साथ।
सरिता सागर में मिली, साहिल हुए अनाथ।।

चप्पल जैसी को सखी, हर पथ रहती साथ।
काँटे कंकड़ से छिले, छिन्न भिन्न है गात।।

दीपक बाती तेल की, मिलती नाँहि मिसाल।
अंग जलाकर दे रहे, जोत भंगिमा लाल।।

चंदन तन शीतल करे, निज तन का बलिदान।
चंदन के बलिदान से, बनती महक महान।।

धूप तपन दे अग्नि सी, शीतलता दे रात।
साथ चले साया सदा, अभ्र करे बरसात।।

कश्ती की भी आतमा, तुच्छ एक पतवार।
खेवन हारा ही करे, नैया से भव पार।।

साँस साँस में नाम हो, मृदु स्वर हो संगीत।
कली अली के संग से, अधर मनोहर गीत।।

पुष्प चढ़े सिर ईश के, तबहू संग सुगंध।
गगन उड़े सँग वात के, संग पुष्प के गंध।।

सुरेश सरल है रासता, चलना कर प्रारम्भ।
बिन स्याही की कलम से, लिखना कर आरम्भ।।

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