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ख़िज़ा फ़िज़ा बन जाती है, सुरेश कविराय की कविता "रिमझिम"

भाती रिमझिम बारिस सबको,
ख़िज़ा फ़िज़ा बन जाती है।
जोवन वसुधा का खिल जाता,
मस्त फ़िज़ा खिल जातीं हैं।।

झूम उठे तरु-पल्लव सारे,
कोयल गाना गाती है।
पंख पसारे नाचे मोरा,
रिमझिम बारिस आती है।।

घटा घिरी है नभ में काली,
निशा दिवस पर छाई है।
नभ से गिरतीं कोमल बूँदें,
शीतलता थल आई है।।

गीत मिलन का गाती बूँदें,
खुशियाँ नई जगाती हैं।
तपती धरती की बाहों में,
बूँदें सकल समाती हैं।।

सुरेश कविराय

#सुरेशकविराय #हिंदी #कविता

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