नारी धीरज धर्म ही, होते सच्चे मित्र।
उदासीन मन में भरे, फटे पुराने चित्र।।
फटे पुराने चित्र, बहुत पीड़ा पहुँचाते।
बुरा लगे संगीत, गीत भी खूब रुलाते।।
ज्ञान सुरेश निदान, रात काली अँधियारी।
वक्त बुरे में नेक, ज्ञान देती निज नारी।।
अच्छे सच्चे मित्र अब, विरले हैं जग माँहि।
कोमलता जाती रही, बची मधुरता नाँहि।।
बची मधुरता नाँहि, कुटिलता भारी मन में।
करके भी शृंगार, अगिन लगती है तन में।।
मित्र हुए कमजोर, बहुत देते हैं गच्चे।
माने आज सुरेश, मित्र कम अच्छे सच्चे।।
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