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दीवारों पर दाग धुँये के, किंचित मन रंजित है मेरा।

दीवारों पर दाग धुँये के,
किंचित मन रंजित है मेरा।
अरमानों को जला दिया है,
रोशन घर करने को तेरा।

चुभन काँच की कंचन समझी,
स्वर सुंदर संगीत बनाया।
नूर वफ़ा का लखि नैनों में,
मर्म वफ़ा बन गीत सुनाया।
किरत कांच क़िस्मत के लेखे,
कांच किरण मणि नूर बिखेरा।
अरमानों को जला दिया है,
रोशन घर करने को तेरा।

तंग गली है बहुत वफ़ा की,
दो का रहना है नाकाफी।
चिंतन की कोशिश की मैंने,
पतला ज्ञान हुआ है काफी।
मै का मरना जनम प्रेम का,
बिना प्रेम के घोर अँधेरा।
अरमानों को जला दिया है,
रोशन घर करने को तेरा।

अक्स वफ़ा का अंतर्मन में,
सूरत दीखत है दरपन में।
हरी हिना घिस रक्तवरण दे,
करुणा सीरत रहती मन में।
मन की गति को मन पहिचाने,
जग में जीवन रैन बसेरा।
अरमानों को जला दिया है,
रोशन घर करने को तेरा।

#सुरेशकविराय   #सुरेशचंद्रा   #हिन्दीकविता

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