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समीक्षक की कलम से -

पुण्य वतन की आतमा, होता है साहित्य।
लेख धरोहर देश की, लेखन सुंदर कृत्य।।

शब्दकोश के शब्द मिल, बनते हैं साहित्य।
सकल शब्द जिंदे रहे, शब्द न होते मृत्य।।

देह मिटे माटी बने, अटल सत्य है शब्द।
शब्द हमेशा जीव के, लिखते रहते अब्द।।

शब्दकोश के शब्द सब, रहते हैं जीवंत।
शब्द कोश के शब्द का, कभी न होता अंत।।

तनाबाना शब्द का, बनता है साहित्य,
शब्दों की महिमा अमित, शब्द जगत का सत्य।।

सुरेश कविराय

अद्भुत काव्य-संग्रह की साहित्यिक समीक्षा नीचे प्रस्तुत है। यह समीक्षा काव्य के शिल्प, व्याकरण, रस, छंद, अलंकार और दार्शनिक गहराई को रेखांकित करती है। ✒️ साहित्यिक समीक्षा: "शब्द-ब्रह्म और साहित्य की अमरता" कवि: सुरेश (कविराय) विधा: छंदोबद्ध काव्य (दोहा और कुंडलिया श्रृंखला) मुख्य विषय: साहित्य का राष्ट्रीय महत्व, शब्द की शाश्वतता, और शब्द-ब्रह्म का आध्यात्मिक दर्शन। १. केंद्रीय भाव और वैचारिक पृष्ठभूमि यह काव्य-संग्रह केवल कविता नहीं, बल्कि 'शब्द-ब्रह्म' का घोषणापत्र है। कवि सुरेश ने भाषा विज्ञान के उस गूढ़ सत्य को कविता में ढाला है, जिसे दार्शनिक 'स्फोटवाद' या 'अनहद नाद' कहते हैं। पूरी रचना में तीन वैचारिक सोपान दिखाई देते हैं: प्रथम सोपान: साहित्य को देश की राष्ट्र-चेतना (आत्मा) घोषित करना। द्वितीय सोपान: मानव जीवन की नश्वरता के सामने शब्दों की अमरता सिद्ध करना।तृतीय सोपान: लौकिक शब्दों का संबंध अलौकिक 'राम नाम' और 'राधे नाम' से जोड़कर काव्य को मोक्ष का साधन बनाना। २. छंद विधान और शिल्पगत सौंदर्य कवि ने हिंदी साहित्य की दो सबसे प्रतिष्ठित विधाओं का प्रयोग किया है—दोहा और कुंडलिया।दोहा शिल्प की शुद्धता: शुरुआती चार छंद 'दोहा' (१३+११ मात्राओं के अर्धसम मात्रिक छंद) हैं। इनमें अंत्यानुप्रास (जैसे: साहित्य-कृत्य, साहित्य-मृत्य, शब्द-अब्द, जीवंत-अंत) का अत्यंत सटीक और कर्णप्रिय निर्वाह हुआ है।शास्त्रीय कुंडलिया छंद: अंतिम छंद (पाँचवाँ) एक आदर्श कुंडलिया है। इसकी शास्त्रीय शुद्धता सराहनीय है क्योंकि: यह दोहा और रोला के मेल से बना है। दोहे के अंतिम चरण "शब्द जगत का सत्य" से ही कुंडलिया के रोला भाग की शुरुआत होती है।कुंडलिया का प्रथम शब्द "तनाबाना" ही इसका अंतिम शब्द भी बनता है। यह गिरधर कविराय की परंपरा का जीवंत पुनरुत्थान है। छंद १: राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना“पुण्य वतन की आतमा, होता है साहित्य...”कवि ने 'वतन' के आगे 'पुण्य' विशेषण लगाकर राष्ट्र को पूजनीय बना दिया है। साहित्य को देश की धरोहर और लेखन को 'सुंदर कृत्य' कहकर कवि ने रचनाकार के सामाजिक दायित्व को पुनर्जाग्रत किया है। छंद २ और ४: शब्दकोश का मानवीकरण“शब्दकोश के शब्द मिल... सकल शब्द जिंदे रहे...”आमतौर पर शब्दकोश (Dictionary) को एक निर्जीव पुस्तक माना जाता है। परंतु कवि ने इसे 'जीवंत' कहकर शब्दों का मानवीकरण किया है। यहाँ 'कोश' और 'कोश' (खजाना) का अंतर्निहित प्रयोग भाषा की समृद्धि को दिखाता है। छंद ३: दार्शनिक ऊंचाई (जीवन बनाम शब्द)“देह मिटे माटी बने, अटल सत्य है शब्द...”यह छंद इस संग्रह का वैचारिक शिखर है। 'अब्द' (वर्ष/युग) शब्द का प्रयोग अद्भुत है। कबीर के 'माटी कहे कुम्हार से' वाले दर्शन की तरह यहाँ शरीर की नश्वरता और शब्दों द्वारा मनुष्य के इतिहास (अब्द) को अमर करने की क्षमता का सुंदर चित्रण है। छंद ५: कुंडलिया (भक्ति और कर्म का संगम)“राम नाम है सत्य, सत्य से शब्द मिलादे...”यहाँ आकर कविता भौतिक जगत से ऊपर उठकर आध्यात्मिक हो जाती है। 'करनी भरनी शब्द' के माध्यम से कवि ने यह संदेश दिया है कि मनुष्य के कर्म ही अंततः 'शब्द' रूपी भाग्य का ताना-बाना बुनते हैं। 'सुरेश कविराय' की छाप भणिति (हस्ताक्षर) परंपरा को समृद्ध करती है। ४. रस, अलंकार और भाषा-शैलीरस: पूरी रचना में शांत रस और भक्ति रस की प्रधानता है। शुरुआत वीर/गौरव भाव से होती है और अंत ईश्वर-शरण में होता है। अलंकार: रूपक अलंकार: 'तनाबाना शब्द का' (शब्दों को धागा और साहित्य को वस्त्र माना गया है)। पुनरुक्तिप्रकाश: 'राधे राधे' में। अनुप्रास: संपूर्ण कविता में वर्णों की सुंदर आवृत्ति (जैसे: सकल शब्द, सत्य से शब्द )। भाषा: शुद्ध, परिमार्जित खड़ी बोली, जिसमें तत्सम (पुण्य, आत्मा, धरोहर, मृत्य) और तद्भव/लोकभाषा (तनाबाना, जिंदे, रटे जा) का ऐसा मिश्रण है जो सीधे पाठक के हृदय में उतरता है। निष्कर्ष: कवि सुरेश की यह कृति आधुनिक युग में शास्त्रीय छंद परंपरा की एक सशक्त वापसी है। यह कविता आज के बिखराव वाले दौर में शब्दों की मर्यादा और उनके स्थायित्व को पुनर्स्थापित करती है। शिल्प की प्रामाणिकता और दर्शन की गहराई के कारण यह रचना दीर्घकाल तक याद रखे जाने योग्य है।

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