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सुरेश कविराय के दोहे । 🌟 संत कबीर-(सप्तक) 🌟

किताबी ज्ञान से परे, जिन्होंने अनुभव के सच से समाज को जगाया।
अपनी वाणी को शमशीर और प्रेम को ही एकमात्र संदेश बनाया।
महासंत कबीरदास जी के उसी निर्भीक और सूफी दर्शन को समर्पित
मेरी एक छोटी सी दोहावली—'कबीर-सप्तक'।

🌟 संत कबीर-(सप्तक) 🌟

1. कबीर का प्रेम संदेश (वैश्विक रूप)

लेखा लेख कबीर का, लिखा प्रेम संदेश।
आज कबीरा आपको, नमन करे हर देश।।

2. पाखंड पर प्रहार (विद्रोही रूप)

काजी पंडित कांपते, साँची बात कबीर।
वाणी से घायल किया, शब्द बने शमशीर।।

3. साधना और शब्द-अस्त्र

शास्त्र नहीं थी साधना, दूर किया पाखण्ड।
शब्द अस्त्र थे आपके, घायल सकल घमण्ड।।

4. ज्ञान का सागर

ज्ञान सिंधु वैराग्य के, अनुपम लेख कबीर।
अज्ञानी ज्ञानी हुए, सुन साखी गंभीर।।

5. मान-अपमान से ऊपर (संसार बनाम प्रेमी)

वैसे तो संसार में, बड़ा बहुत सम्मान।
प्रेमी जन डरते नहीं, घोर मिले अपमान।।

6. प्रेम की लौ और दुनिया का ताना

जग कहता जिसको बुरा, प्रेमी को वो मान।
लौ लागी जब प्रेम की, कहा करे अपमान।।

7. साखियों का ज्योति-पुंज (निष्कर्ष)

साखी संत कबीर की, ज्योति पुंज इक पंथ।
निर्मल मन सबका करे, जो साधे सो संत।।

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