साधना
शूल बिछे हैं पथ पर मेरे, छाले मेरे पायन में।
चलकर मंज़िल पर पहुँचा हूँ, छेद हुए बहु दामन में।।
बना खाद मैं नीर बना हूँ, रैन बिताई मधुबन में।
आठ पहर खिदमत में बीते, फूल खिले तब आँगन में।।
नेक राह पर चलना सीखा, फँसा नहीं मन उलझन में।
विषधर बेशक लिपटे रहते, गरल नहीं है चंदन में।।
अर्पण खुद को मैं करता हूँ, शीश झुका कर वंदन में।
धन्य पिताजी माता मोरी, करूँ आरती प्रतिदिन में।।
अंतर्मन को रिक्त किया तब, ज्ञान मिला निज जीवन में।
परउपकारी भाव जगा तब, महक उठी है तन मन में।।
तेरी रहमत की गाथा है, चमक मिली है कंचन में।
कुसुम बिना खुशबू फिर कैसी, ढूँढ रहा हूँ उपवन में।।
सुरेश चंद्रा सुरेश कविराय
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