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स्वागतम्

 


"शब्दों के इस पावन उपवन में आपका हार्दिक स्वागत है..."साहित्य अनुरागी पाठकों और मित्रों, मैं सुरेश 'कविराय' माँ शारदे के आशीर्वाद से अपनी अनुभूतियों को छंदों, दोहों, कुण्डलियों, गीतों और ग़ज़लों में पिरोने का एक लघु प्रयास कर रहा हूँ। यह वेबसाइट केवल मेरी रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि मेरे और आपके बीच विचारों का एक संगम है। यहाँ आपको समसामयिक विषयों पर तीखे प्रहार करती कुण्डलियाँ भी मिलेंगी और जीवन के विविध रंगों को समेटे गीत-मुक्तक व सार्थक दोहे भी। आइए, इस साहित्यिक यात्रा में मिलकर साथ चलें।

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न कोई याद आता है सुरेश कविराय के मुक्तक

  नहीं दिल में रहा कोई, न कोई याद आता है। मगर इक दर्द है दिल में, वही हर पल सताता है। दिमागी हाल अच्छा है, मगर वो ख़्वाब सच्चा है। बसा जो रूह के अंदर, पता अंतस बताता है।। सुरेश कविराय #सुरेशकविराय #हिंदी #मुक्तक

आज विषैली हो गई

 "राजनीतिक संवादों में जब मर्यादा और तर्क की जगह अंधभक्ति और हिंसा ले ले, तो समाज का ताना-बाना बिखरने लगता है। जहाँ रक्षक ही भक्षक बनकर आस्था और विश्वास को लूटने लगें, वहाँ न्याय की बुनियादी हवा भी ज़हरीली महसूस होने लगती है। आइए, इसी कड़वे सच से साक्षात्कार कराती यह रचना सुनें..." आज विषैली हो गयी, राजनीति की बात,  अंधभक्त हाबी हुये, चलते घूँसा लात।  चलते घूँसा लात, झूँठ को साँच बताते,  कहते चौकीदार, लूट मंदिर को खाते।  कहि सुरेश कविराय, अनीती इनकी शैली,  न्यायालय में गंध, फैलती आज विषैली।। #कुंडलियाँ #हिंदीसाहित्य #सुरेशकविराय

शिक्षा देती ज्ञान

  पोथी रट पंडित बने, भीतर भरा कबाड़। पाखंडों का देश में, ऊँचा खड़ा पहाड़। ऊँचा खड़ा पहाड़, तर्क से ढोंगी डरता। नफ़रत का बाज़ार, गरम पाखण्डी करता।। कहि सुरेश कविराय, छोड़ सब बातें थोथी। शिक्षा देती ज्ञान, छोड़ दे रटना पोथी।। सुरेश कविराय