"गंगा और जमुना का बहता पानी सदियों से इस देश की मुहब्बत की गवाही देता आया है, क्योंकि नफ़रत इस मिट्टी के मिज़ाज में कभी थी ही नहीं। लेकिन जब सियासत की आड़ में नफ़रत का मैला जाल फैलाया जाने लगे, तब इस मुल्क की साझी विरासत को बचाने के लिए सच की आवाज़ उठाना ज़रूरी हो जाता है। आइए, इसी कड़वे सच को बयां करती यह रचना सुनें..."
फैला जो नफ़रत रहे, उनका करो इलाज़,
मेरे भारत देश का, ऐसा नहीं मिजाज।
ऐसा नहीं मिजाज, कहे ये जमुना गंगा,
नफ़रत की सरकार, चलाते बिल्ला रंगा।
कहि सुरेश कविराय, भरा उर अंदर मैला।
नफ़रत हुई सवार, जाल नफ़रत का फैला।।
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