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बाबा की भी खुल गईं


 "आस्था जब व्यापार बन जाए और धर्म जब सत्ता की सीढ़ी चढ़ने लगे, तो साख का डूबना निश्चित है। जब घपलों और घोटालों पर साधक का मौन टूटता है, तब समझ आता है कि मजबूरी के पीछे सच को छिपाने का कैसा खेल खेला जा रहा था। आइए, इसी पाखंड पर करारी चोट करती यह रचना सुनें..."

बाबा की भी खुल गयी, भैया दोनों आँख।

सत्ता सँग व्यापार कर, डूब गयी सब साख।

डूब गयी सब साख, आँख बाबा दिखलाबे,

बाबा भी मजबूर, कहाँ तक दोष छिपाबे।

कहि सुरेश कविराय, पिटा बाबा का दाबा,

घपलों पर था मौन, मगर अब बोला बाबा।।

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