"वोट के समय हाथ जोड़ने वाले नेता जब संसद की चौखट पर पहुँचते हैं, तो जनता के सवाल और अपने वादे दोनों भूल जाते हैं,
लेकिन जब देश की जागरूक जनता जागती है, तो छलावे और विघटन की राजनीति करने वालों का असली चेहरा साफ़ दिखने लगता है। इसी जन-आक्रोश को बयां करती ये पंक्तियाँ- कुण्डलियाँ छंद में प्रस्तुत हैं। आप पढ़े, सुने, like, comments और share करें। धन्यवाद!
आते संसद में नहीं, देते नहीं जबाब,
जनता जागी देश की, नेता धोखेबाज।
नेता धोखेबाज, सुने ना ये जनता की,
विघटनकारी सोच, बात भूले समता की।
कहि सुरेश कविराय, भूल सब वादे जाते,
जनता का सम्मान, भूल कर संसद आते।।
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