मंज़िल में वाधा बनें, लोभ मोह सुख चंद।
नाम उतारे पार भव, अमित भाव स्वच्छंद।।
अमित भाव स्वच्छंद, अकेला एक सहारा।
राम नाम की नाव, मिलेगा आप किनारा।।
कहि सुरेश कविराय, नदी के साथी साहिल।
साहिल दोनों साथ, मिली सरिता को मंज़िल।।
सुरेश कविराय
#कुंडलियाँ #हिंदीसाहित्य #सुरेशकविराय
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें