अच्छे सच्चे मित्र अब, विरले हैं जग माँहि।
कोमलता जाती रही, बची मधुरता नाँहि।।
बची मधुरता नाँहि, कुटिलता भारी मन में।
करके भी शृंगार, अगिन लगती है तन में।।
मित्र हुए कमजोर, बहुत देते हैं गच्चे।
माने आज सुरेश, मित्र कम अच्छे सच्चे।।
सुरेश कविराय
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