रखना होगा फ़ासला, जीव जगत के बीच।
देख अमर है आतमा, देह जगत नवनीच।।
देह जगत नवनीच, मरम वैरागी जाने।
एक जगत वैराग्य, न बिल्कुल मन की माने।
कहता खरी सुरेश, रूह के माफिक चलना।
निकट रहे वैराग्य, दूर इस मन को रखना।।
सुरेश कविराय
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